Monday, June 1, 2009

विश्व तोब्बाको निषेध दिवस

मई ३१ को विश तोब्बाको निषेध दिवस के रूप मै मनाया जाता हें। ये दिन, विश स्वाथ्य केलेंडर मै एक अहम दिन होता हें । सिगारेट , गुटका , पान , सराव जेसे जहरीला चीज से लोगो को दूर रखने के लिए , जाती संघ के '' विश्व स्वास्थ्य संगठन '' वा ''वोल्ड हेल्थ ओर्गानैजेसन '' से तरफ से हर साल मै ३१ को लोगो को जागरूक किया जाता हें । इस दिन , विभिन्न सरकारी , वे-सरकारी संथाओं के साथ विभिन्न स्कूल और कालेज की स्टुडेंट भी लोगो को जागरूक लाने के लिए पहल करते हें। इस के अलावा , विभीन्न संथाओं के द्वारा नाटक , सांस्कृतीक कार्यक्रम , संगीत के माद्यम से भी लोगो को टोबाको के खतरनाक परिणाम के विषय मै लोगो को आगाज किया जाता हें । इस के बाबजुड़ , लोग अपनी आदत छोड़ते नही।
सन २००० मै आमेरीका के '' फोरेन एग्रीकल्चर आफीस'' के तरफ से किया गया एक आंकलन के अनुसार, भारत मै ५९५.४ हजार टन टोबाको जेसे विभिन्न जहरीला पदार्थ बिकता हें । ''दी ग्लोबाल तोब्बाको ओर्गानैगेसन '' के तरफ से २००८ मैं , एक आंकलन के अनुसार , भारत मैं , पुरुस ३३.१ % और महीला ३.८ % तोब्बाको सेवन करते हें । भारत मै तोब्बको की मात्रा जादा ही हें । ये तोब्बको की इतिहास बड़ी रोचक हें । सबसे पहेले , आमेरीका मै, तोब्बको , पाईप और स्नाफ़ ब्यबहार किया गया । इस के बाद , सिगार और तोब्बाको ,चुईंगम के रूप मै लोगो ने इस्तिमाल किया। सन १८१२ तक , यूरोप के बाकी हिसो मै तोब्बाको की मांग जोर पकडा। विशेस रूप से , ''शिल्प विप्लब'' के द्वारान तोब्बाको की आछी खासी प्रसार हुई। जिस के वाद, तोब्बाको सारे विश्व मै फेल गया , जो आज लोगो की जरुरत मंद चीज हो चुका हें ।
मोटे दौर पर, ये तोब्बाको १० किसम की होते हें । जेसे , १-आरोमेतिक फईर -क्युर्द , २-ब्राईटलीफ तोब्बाको , ३-बर्ली, ४- कवेंदिश , ५-क्रिओलो ,६- अरिएंटेल तोब्बाको , ७- पेर्कुई , ८-सेड तोब्बाको , ९- व्हाईट बर्ली और १०- वाईल्ड तोब्बाको । ये सारे किस्म की तोब्बाको जहरीला और खतरनाक होते हें । आज कल , टेलीविसन मै अनेक सीरियल और सरकार के तरफ से प्रायोजित कार्यक्रम मै तोब्बाको की भयंकर परिणाम के वारे मै बताया जाता हें । उदाहरण के तोर पर , कोई गुटका /तंबाकू खा कर , यदि आप किसी पौधे पर फेंक देंगे , व पौधा मर जाता हें । इस के अलावा , यदि आप तन्ब्बाकू को मुह मै रात भर रख कर सो जायेंगे , आप जब सुबह उठेंगे , तब आप की मुह मै छेला से भर जायेगा। आप खाने की दूर , आप पानी भी मुस्किल से नसीब हो पायेगा । ये सारे जहरीला चीज का परीणाम के दौर पर , हमें केंसर, किडनी ख़राब जेसे बीमारी का सामना करना पड़ता हें । ''वर्ल्ड हेल्थ ओर्गानैजेसन '' के तरफ के अनुसार , मोटे दौर पर टोबाको खाने से ५ किसम की बिमारी हो सकता हें । जेसे, १-बेक्तेरीया डिजीज , २-फंगल डिजीज , ३- नेमात्रोड्स पारास्तिक , ४- भाईराल अंड माई-कोप्लास्मालैक ओर्गानैजेसन (एम् .एल .ओ ) डिजीज, और ५- मीससेल्लानिऔस डिजीज अंड दिसअदर्स । ये सारे बीमारी सिर्फ़ और सिर्फ़ तंबाकू खाने पर ही होता हें ।
विश्व के दुसरे देश के तरह , हमारे देश मै भी सरकार के तरफ से तोंब्बाको के लिए कड़े कदम उठाया गया । जेसे , १८ वर्ष से निचे की आयु के वक्ती को तोंबाको वेचना दण्डनीय अपराध हें , सव साधारण और होस्पिताल के पास सिगारेट , सराव पीना अपराध माना जाएगा । इस के साथ ही, तोब्बाको कंपानी , अपनी नाम की निचे , ''तोब्बाको इज ईंजरिओउस फॉर हेल्थ '' मोटो लिखना जरुरी किया गया हें । इस साल से , तोब्बाको से जुड़े हर कंपनी , अपनी प्राडक्ट के १/४ % हिस्सा तोब्बाको से होने वाला नुक्सान के वारे मैं चित्र देना , सरकार के तरफ से जरुरी किया गया हें । परन्तु , सरकार भी लाचार हें । कियु की, सरकार और विभीन्न संस्थाओं के द्वारा , मई ३१ को हमें सचेत किया जाता हें । परन्तु , तमाम कोशिश करने के बाबजूद , लोगो के ऊपर कोई असर नही होता हें । नियम -कानून से इस विषय को समाधान नही किया जा सकता हें । जब तक हम सचेत नही होंगे , तब तक कोई कुछ नही कर सकता हें । आख़िर , हामारे स्वास्थय की फिकर ख़ुद को ही करना चाहिए । यदि , आज हम इस विषय को नजर अंदाज कर रहे हें, इस के परिणाम स्वरुप हमें ही आनेवाले वक्त पर भुगतना पड़ेगा । इसलिए , यदि आज हम सचेत होंगे , आनेवाले कल निचित रूप से नई सुबह की नई किरण के रूप मै हमारे जिन्दगी मै उजाला लाएगी ।

Thursday, May 28, 2009

चुनाव....

भाई अगया चुनाव ,
ये लोकतंत्र का सबसे बड़ा महापर्व .....

नेता घर से घर जा कर मांगते हें भोट
वादा पे वादा, सब कुछ कर के दिखायेंगे,
सिर्फ़ मुझे भोट दीजिये
और पाँच साल के लिए ......

आखिर, पाँच साल के बाद ,
फ़िर नेता दीखते हें ,
बीच मै , उनको जनता की याद नही ,
सायद, नेता भूल गए उनके वादा ......

ये देश की नेता भूल जाते हें , जल्दी वादा,
सिर्फ़ पाँच साल के वाद , याद आते हें जनता,
लोग नेताओ के मदत के लिए रोज पिसते हें ,
परन्तु, उनके बात सुनने के लिए कोई नही हें .......

ये भाई लोकतंत्र हें हमारा,
वाहा, वाहा , नेताओ की किया कहेना,
हें भगवान् , इन नेताओं को थोड़ा सदबुद्धि देना .......

Wednesday, May 27, 2009

ये चुनाब फिल्मी हें ....

ये चुनाब फिल्मी हें । जी हाँ , मौजूदा साल हुई , पंदरवा चुनाब को देख कर ये ही प्रतीत हो रहा हें । इस साल की चुनाब मै, नेताओ के लिए कोई मुदा ही नही था । हमारे नेताओ के लिए, लोगो की मौलिक समस्या, जेसे- विजुकी, सड़क और पानी की कोई अहम् मुदा नही था । एसे लग रा था, जेसे देश मै कोई समस्या ही नही था । एक बात सच हे, हमारे नेताओ को पिछले चुनाब मै किया हुआ वादा आज तक , पूरा हुआ या नही । ये तो सिर्फ़ देश की जनता ही बता सकते हे ।
हमारे नेताओ कोई चुनाब स्टाईल किसी फ़िल्म शो से कम नही था । चुनाब प्रचार के द्वारान एक्टिंग, स्क्रिप्ट के साथ पीछे से दिरेक्टोर की भूमिका भी सुर्खिया बनी। इस देश की नेताओं को पता हे, ये देश की वोटर बहत भोले होते हें, जिनको धर्म, जाती, भासा के नाम पर आपसे लढाई कर ख़ुद फाईदा ले सकते हो । सिर्फ़ आग मै घी डालना चाहिए । जी हाँ, मौजूदा दौर की सभी छोटे और बड़े नेताओं की ये ही स्टाईल । देखए ना, मुना भाई अभिनय से नेता बने और उसके बाद, समाजबादी पार्टी के महासचिब संजय दत की स्टाईल । वह उत्तर प्रदेश राज्य के मयु मै, उनको बीते हुए कल की याद आगया । उनके बात को माने तो , वह कहेते हें, वह जब जेल मै थे, उनको ये कहेकर मार रहे थे, कियु की उनकी माँ मुस्लिम थी। इस बात को राजनैतिक विश्लेषण से जुड़े लोगो का कहेना हे, मुना भाई को, आख़िर इतने साल के बाद , वह बात कियु याद आया । यदि ये बात सच हे, संजय डट तब कियु अदालत को नही बताया
और, मुना भाई को सिर्फ़ मौऊ जेसे मुस्लिम आबादी इलाका मै ही ये बात याद आया । ये बात साफ़ हे, वह अनजाने मै नही कहा । वह तो राजनीति मै नए हे । जाहिर सी बात हे, ये चालाकी समाजबादी पार्टी की महासचिब अमर सिंह की होगी या मुलायम सिंह यादब की होगी । ये सकुनी की चाल ,हामारे लोगो को पता केसे होगा, आख़िर परधे की पीछे किया खिचडी पक रही हें ।
वेसे ही , बीजेपी के नेता वरुण गांधी की , पीलीभीत मै दिया भड़काओ भासन किसी से छुपा नही हें । वरुण गांधी से एक कदम आगे, बिहार के किसानगंज मै, आर.जे.दी के नेता लालू प्रसाद यादव ने दिया हुआ भासान , मौजूदा दौर मै गुजरती लोकतंत्र की बदहाली का ये छोटा सा नमूना हे । इस दौर मै, सभी छोटे , बड़े और वरिस्थ नेता ने आपनी आपनी छाप छोड़ी हें ।
मौजूदा दौर की हालत मै, नेताओं को मीडिया मै आपनी मज्दुगी दिलाने के लिए , नेता कुछ भी बोल लेते हें, वह ये भी कभी सोचते नही, उनके ये बात से किसी के दिल को ठेस पहंच सकता हे या उनकी जख्मी मै नमक डालना जेसे ही होगा । आज हर जगह पर धर्म, भासा, और जाती के नाम पर लढाई होता हे । हामारे नेता, इस लढाई का ऐ.सी रूम मै मजा लेते हें । इस लिए आज वक्त आगया, हम वोट डालने से पहेले , उनकी ख़ुद की पहेचान की बदले उनकी , निर्वाचन खेत्र मै किया हुआ विकाश और दुसरे पहेलु को देख कर वोट देंगे । इसलिए, '' वोटर जागो
वोटर जागो '' ।

Sunday, January 11, 2009

आज की बचे,आनेवाले कल की सीतारे हें...

विश्व मैं सभी देशो से , भारत सबसे अलग हें। कियु की, यहाँ , बिभीन धर्म , भाषा , और जाती के लोग , एक साथ रहेते हें। सभी नकरी कर के , पैसा जमा करते हें, और अपनी भाबिस्य के लिए सोचते हें। परन्तु, एसे भी बहत लोग हें, जो स्वल्प कमाई बजह से , जादा कुछ , अपनी परिवार के लिए कर नही पाते हें। इस देश मैं कोई, एसी-घर बनाता हें, कोई एक , पका मकान बनाने के लिए , जिन्दगी भर लग जाता हें। फ़िर भी , अपनी परिवार के साथ , सभी , खुसी और गम के साथ रहेते हें।
भले ही , सरकार का योजना और आंकडा , गरीवी हटाओ की कोशीश करता हें, परन्तु, हकीकत हें, आज भी, आजादी के ६० साल बाद भी , बहत लोग ''गरीवी रेखा'' के निचे मै, हें। आप, हर राज्यों की , ग्रामीण इलाके की सफर कीजीये , तब एहेसास होगा, सरकार की गरीवी हटाओ की नारे खोकला साब्यस्त हो रहा हें। झुदी- झुप्दियो मैं, बतर हालत मैं, लोग रहेते हें। वहां, के बचो की पढाई की बागडौर , सुरु होने से पहेले ही, ख़तम हो जता हें। छोटी सी उमर से, बोचो को काम करने जाना पड़ रहा हें। कियु की , माँ-बाप की जोर होता हें, बचे पढाई की जगह , कुछ काम कर के रोजगार करे। माँ-बाप की , ये सोच ग़लत हें, परन्तु, व, अपनी परिस्थितियों की बजह से, मजबूर हें। यदि, बचे काम पर नही जाएँगे, घर की चुला केसे चलेगा ? ये गरीवी, आम आदमी को ब्याबस करता हे, कम मजदूरी मैं काम करने के लिए, आखीर दो वक्त की रोटी के लिए हे ना....
कौन नही चाहता हें , उसका बच्चा पढाई कर के , तरकी करे । हर माँ-बाप की सपना होता हें, उनकी बचे , कुछ बन कर , अपनी जीबन अच्छा से गुजारे। परन्तु, ये सभी सपना , हर किसी का पूरा नही होता हें। आप, ग्रामीण इलाकों से मुड कर , सहरी और महानगर इलाकों मैं बापस आईये। आपको, रेलवे स्टेसन, ट्राफिक सिग्नाल, मन्दिर और मार्केट मैं , एसे बहत बचे मिल जायेंगे , जिनका उमर १०-१२ साल की निचे होता हें। देश की राजधानी दिल्ली , जहाँ , सरकार की आईन-कानून बना जाता हें, वहां पर, आपको , हर तरफ वाल-श्रमीक मिल जायेंगे। दिल्ली मैं, सरकार की नाक की निचे, बनाई गयी कानून की धजिया उडाया जा रहा हें। ट्रेन मैं , बचे सफाई कर कर पैसा मांगते हें। कभी कभी , इस बहाने चोरी भी करते हें। ये छोटा मोटा चोरी से , भाबिस्य मैं, उनको एक बिशाल अन्धकार की गुनाह मैं, भेज देता हें। ये , मज़बूरी , उन बोचो की जिन्दगी बन जता हें। जेसे, मिर्ची चोरी से विरापन, चंदन तस्कर बना था। जब आप , ट्राफिक सिग्नाल पर खड़े होते हें, तब कुछ बचे पेपर , मैगजीन बेचते हुए नजर देख सकते हें। व सभी बचो की उमर १५ साल की निचे ही होंगे। जिस बोचो की उमर, पेपर , मैगजीन पढने की हें, परन्तु, इस उमर मैं ,व पेपर , मैगजीन बेचने के लिए मजबूर हें। हमें, मार्केट मैं, बहत ही कम उमर की बचो को कुछ ना कुछ बेचते हुए नजर आएंगे। मुझे याद हें, मैं पिछले १५ अगस्त को , दिल्ली के आई.न.ऐ मार्केट गया था। वहां, मैं ७-८ साल की उमर की लड़की को रसी बेचती हुए देखा। मैं, रसी का कीमत पूछ कर, बापस आरहा था, उस वक्त, व लड़की ने, कहेना लगा - '' बाबूजी रसी ले जाओ, आप को कम कर के देता हूँ'' । व छोटी सी बची ने, जिस तरीके से मुझे खरीद ने के लिए कहा, व बास्तविक मैं बहत ही, दर्दनाक था। मैं, उस लड़की से , पढाई की वारे मैं पुचा। उसकी जबाब था- ''ना येही काम करती हूँ ...'' । उसकी बातों से मुझे लग रहा था, व पढ़ना चहाता हें, परतु, व मजबूर हें। तब मुझे महेसुस हुआ, चाहत किया होता हें। एक तरफ व बची हें, जो चाहाते हुए भी, पड़ नही पाती हें, दुसरे तरफ , व बचे हें, जो पढाई की हर सुबिधा होते हुए भी, नही पढ़ते हें। । आज भी मैं, जब, आई.न.ऐ मार्केट हुए , गुजरता हूँ, व छोटी लड़की की झलक नजर आता हें। जिस उमर मैं, व खेलने की उम्र थी, उस उमर मैं, व सडक के किनारे पर , रसी बेच रही हें। उस लड़की जेसा, पुरे देश भर मैं , आपको सेंकोडो बचे मिल जायेंगे, जो एसी हालत मैं, बेवस की जिन्देगी गुजारते हें।
भारत मैं , वाल-श्रमिक को हटाने और , कम उम्र की बचो को शीख्या देने सम्भंधीय कानून बनी हुई हें। जेसे भारत की संभीधान की धारा २४ के अनुसार-'' १४ साल से कम उम्र के बचो को , खान, उद्योग जेसे बीपद्जनक जगह पर काम करने के लिए इजाजत नही हें ''। भारतीय संभीधान की धारा ४५ कहेता हें-'' १४ साल से कम उम्र के बचो को मुफ्त मैं पढाई का बन्दोव्स्थ किया जाए'' । इस के अलावा, भारतीय संभीधान के ८६ वा संभीधान के द्वारा, धारा ५१(क) कहेता हें, '' १४ साल से कम उम्र के बचो को कंपलसरी शिख्स्या देने की बात किया गया हें '' । इस के साथ साथ , भारत सरकार ने, बाल-श्रमिक कानून बनाई हें। जिस मैं, कानून की नजर अंदाज़ करने बाले मालीको के खीलाप शक्त कानूनी करवाई का भी प्राबधान हें।
परन्तु, सरकार कानून बना कर पला झाड़ लेता हें। इन बाल-श्रमिकों के लिए कोई दूसरी विकल्प मुहया नही करता हें। इसका, खामीयाजा , उस बचो के भुगतना पड़ता हें, जिनकी कमाई के भरसे, उनके परिवर का रोजी -रोटी चलता हें। कियु की, कानून बजह से, कोई कम उम्र के बचो को , काम करने के लिए रखता नही। आखीर मैं, व बचे सर्ट-कट या चोरी की रास्ता को चुनते हें। इसे ही, जादातर , गरीवी से तंग आकर, पैसा कमाने के लिए, गुनाह की दुनिया मै दाखीला लेते हें।
वाल- श्रमीक, एसा बिषय हें, जो आज की कमोवेश समाज की स्थितयों की बयान करता हें। वाल-श्रमिक का समाधान , आईन-कानून की शक्ती से समाधान नही होगा। इस के लिए, सबसे पहेले, लोगो को सचेतना होना होगा। देश की बड़े बड़े कंपनियों को, गरीवी बचो की मदत करने के लिए आगे अना चाहिए। इस के अलावा, केन्द्र-राज्यों सरकार को मिल कर, इस समस्या का हल ढूंढना पडेगा। वाल-श्रमिक का समाधान, पहल और , कोशिश से ही, अंत हो सकता हे। कियु की, आज के बचे, आने वाला कल की सितारे हें....

Tuesday, January 6, 2009

हम साथ साथ हें

भारत १५ अगस्त १९४७ को स्वाधीन हुआ , और २६ जनवरी १९५० को गणतंत्र रास्ट्र के रूप मैं, विश्व स्टार पर , अपनी पहेचन बनाई। हम व, सभी दर्दनाक हादसों को भूल नही पाएँगे, जो भारत के स्वाधीन होने के वक्त हुआ था। आज भी, व दंगो को याद करके , लोग सहमे जाते हें। बस्ताविक , यहाँ घटना होने के बाबजूद भी, लोगो ने , अपनी हीमत नही खोया, और होसले के साथ , सब कुछ भूल कर, नई सुबह की , नई किरण के साथ, अपनी अपनी , जिन्देगी की सुरुवात फ़िर किया।
आहिस्ता आहिस्ता, भारत की लोगो की जिन्देगी, पटरी पर दौड़ने लगा , और , एक नई उमीद लेकर , देश की प्रगती मैं साझेदारी बने। आज, उस हिमत का नतीजा के रूप मैं, बारात मैं, रिलाईंस, टाटा, बिरला, मीतल जेसे विश्व के बड़े बड़े कंपनियों ने , दुनिया के सामने खडा हें। भारत की स्वाधीनता के ६० साल बाद , भारत की तस्वीर , दुनिया मैं, एक उज्वल -ग्लोबल देश की रूप मैं, उभर कर आया हें। इस के साथ साथ , भारत साईंस, तकनीक, शिल्प, बाणिज्य और राख्या मामलो मैं, अबल हें, और, दुनिया के प्रमुख पाँच रास्त्रो के बाद, भारत अपनी दबेदारी थोक रहा हें।
भारत की प्रगती के तरफ कदम उठामें, भारत की लोगो के रास्त्रो प्रती, बिस्वास, देशभक्ति , और एकता जेसे भाबना भी अहम् रहा हें। आज, भारत स्वाधीनता के ६० साल बाद भी , यही एकता के बदौलत, अनेक धर्म, जाती, भाषा,और राज्यों के बाबजूद , हम एक हें। इसलिए, सारा दुनिया के सामने, हामारे देश की अलग ही पहेचान हें। परन्तु, इस साल की ख़तम होते होते , इसे प्रतीत हो रा हे , ये एकता मैं, आहिस्ता आहिस्ता , छेद हो रहां हें। कियु की, आज कुछ दिनों से धर्म धर्म-धर्म के विच संप्रदईक्ता दंगा भड़क रहा हें, जाती- जाती के विच भेद , और, भाषा-भाषा के विच टकराब जेसे अन्चालिक्ताबाद का तान्दाब रूप दिखने लगा हें।
कियु एसा हो रहा हें ? हामारे बनाई हुई एकता, बिस्वास को, कौन तोड़ना चाहता हें ? हम हकीकत को जानने से पहेले ही, दुसरो की, बथो से, कियु, बेहेकाब मैं, आते हें ? ये सारे सबाल, आज भारत-माता , ये मतुभुमी , हमें, चिला चिला करके पुच रहा हें,- आखीर कियु , धर्म, जाती , भाषा के नाम पर , आपसे लाद रहे हो ? आखीर कियु, हिन्दुस्थान एक होने के बाबजूद , हामारे दिल मैं, दुसरे की प्रती , इतनी घृणा कियु कियु कियु ?
ये सारे सबाल , आज मौजूदा हालत मैं बार बार उठ रहा हें। परन्तु, कोई , इस बिसय को मालूम करने की इच्छा शक्ति नही हें। हम, दुसरे की बथो से, बहेकर , ग़लत कदम उठा लेते हें, जो की , हम लोग ही, जोश मैं, होश खो कर , परिसानी झेलना पड़ता हें। आगे जाकर , हम या हमारे रिश्तेदारों को, बहत मुशिव्त का सामना करना पड़ता हें। परन्तु, जो लोग, हामारे द्वारा , ये सब घीलोना हरकत करवाते हें, व , अपनी फाईदा की चाकर मैं रहेते हें, और , सब कुछ देख कर भी दृस्त्रस्ता बन जाते हें। हम, अदालत से ठोकर खा कर , जेल मैं, चाकी पिसते हें। तब , हम लोगो की हालत पूछने बाला कोई नही होता हें। आखीर , ग़लत काम का नतीजा, भयानक ही होता हें।
खेर, इस साल मैं, ये आशा करना चाहिए , पिछले साल जेसा, भयानक और दर्दनाक घटनाओ का सिलसिला थम कर , फ़िर से दुबारा दोहरा ना जाए। जो हुआ , सो हुआ। हम , सब कुछ भूलकर , आपस की तनाब को बिराम दे कर , हम लोग फ़िर आगे मिल कर बढ़ेंगे। जिस मैं, इस मिती या देश मैं, फ़िर से रोनक आयेगा, और, देश की खोया जा रहा पहेचन फ़िर बापस आयेगा। आखीर, हम सब एक हे ना ....

Tuesday, December 23, 2008

नियोजित बिकाश की राजनीति

इस्पात की बिस्वयापी मांग के बढ़ते हुए, आंकलन और भारत मैं सभी प्राकृतिक संपद का गछित होना, बिदेशी कंपनियों का भारत के तरफ़ रुख करना लाजमी हें। यह बात सही हें, सरकार भी , ये सोच कर कदम उठाती हें, प्राईवेट सेक्टर की पूंजी बिनियोग से , लोग को साधन मिल जाए और आज के बेरोजगारी दौर पर गुजर रही , देश की हालत मैं , दो दो फाईदा हो सकता हें। ये सोच , मोजुदा ओडिशा सरकार का भी था , जो अब , भारी चर्चा मै बना हुआ हें। कियु की, ओडिशा मैं , कोरिया के कंपनी पोस्को पूंजी लगाना चाहाता हें। उसके साथ साथ , बिरला, टाटा, बेदांत, रेलाईंस जेसे विश्व के बड़े बड़े कंपनियों का भी , ओडिशा के ऊपर नजर हें। परन्तु , सबसे बड़ा परिसानी हें,- आईरन, कोयेला, बाक्साईट, जेसे खान का जो इलाका हें, वो पुरे, अनाग्रसित तथा, आदिवासी इलाका हें। लोग , अपनी जमीन, घर , को छोड़ कर जाना नही चाहाते हें, और, वे सरकार की बिस्थापन निति से खुस नही हें। इसलिए हर जगह पर , बिरुध का माहोल बना हुआ हें।
इस बिसय पर हर किसीका नजरिया अलग अलग हें। अर्थसास्त्री , इस जगतीकरण और उदारीकरण को मोजुदा हाल के लिए ठीक मानते हें। केन्द्र -सरकार को लगता हें, एसे ही , बिदेशी कंपनियों को नाराज किया गया , इस का प्रभाब , विश्व-अर्थनीति पर पडेगा। इसके अलावा, पर्यबरण से जुड़े लोगो का मानना हें, अद्योग बसने से, जंगल, मिती के साथ साथ , प्राकृतिक माहोल के ऊपर भी असर पडेगा। परन्तु, राजनैतिक दलों का अपनी अपनी फाईदा देख रहे हें। कियु की , आछा रकम की नोटों की गदिया , जो कंपनियों से मिल रहा हें। जाहिर सी बात हें, दुसरे दोलो , इसका बिरुद्ध करेंगे। परन्तु, कोई इस मामले को सुलझ ना नही चाहाते हें । जेसे वेस्ट -बंगाल के नंदीग्राम और सिंगुर मैं, टाटा को लेकर गतिरोध बना हुआ हें। एसे ही , ओडिशा मैं , सबसे जादा ७ जगह पर , सरकार और स्थानीय लोगो के विच गतिरोध बना हुआ हें। इस के अलावा , आंध्र-प्रदेश, कर्नाटक, महारास्त्र, पंजाब और हरियाणा मैं एक एक जगह पर गतिरोध बना हुआ हें। किया ये बिकाश का परिभासा हें ? किया कोई जमीन से जुड़े फैसला लेने से पहेले , स्तानीय लोगो का मत लेना नही चाहिए ? किया ये लोक-तंत्र का परिभाषा हें ?
देखा जाए तो, सुरुआती क़दम आछा था, जब पहेला पञ्च-वार्षिक योजना बना गया था। परन्तु, आद्योगीकरण की तेज रफ़्तार ने, पूंजी बिनियोग का एक बेकाबू हिसा हो गया। इस रफ़्तार को बढावा देने मैं , श्री पि. सी. महाल्नोविस, श्री जे. सी. कुमारापा, डॉ. मनमोहन सिंह, जेसे दिगज अर्थासस्त्रियो का हाथ हें। जो खोले बाजार मैं , पूंजी बिनियोग तथा, जगतीकरण और उदारीकरण हेतु, कंपनियों के प्रतियोगिता के विच , सरकार आम-आदमी को भूल जता हें, जिस जमीन पर, आप अद्योग खडा करना चाहेते हें।
सुरुआती दौर मैं, जो जो कदम उठाई गई , व , सभी आज खोखला साबित हो रहा हें। इसका , सबसे बड़े बजा हें, राजनैतिक इच्छा -शक्ति का अभाब हें। अनाज जमीन पर , अद्योग का बिस्तार से , फसल नही हो पा रहा हें, और खाद्य संकट दिखाई दिया। जब , जगतीकरण और उदारीकरण का पहल किया गया था, तब खादिया और ग्रामीण इलाका के वारे मैं , सोचा नही गया था, जो, आज संकट के रूप मैं, उभर रही हें, जो की हम सब को पता हें। इसका ये मतलब हुआ हें, तत्कालीन सरकार और प्रशासन ने , कोई ठोस नीती, योजना नही बनाया था। जिस का परिणाम , आज सब को भुगतना पड़ रा हें।
इसलिए, नियोजित बिकाश की राजनीती मैं , यदि राजनैतिक टकराब , योजना आयोग की बिफल योजना, सुरुआती कदम मैं, कमजोरी कडिया , जेसे स्थितिया जादा होंगे, तब तब , खादिया संकट , भूमि सुधार- आन्दोलन , जेसे परिस्थितिया बार बार आएगी , और इसके लिए , लोग बंगाल के नंदीग्राम और सिंगुर , ओडिशा के कलिंग-नगर , कुजंग जेसे परिस्थितिया बार बार , इतिहास के पनो मैं दोहारा ने के लिए कोशिश करते रहेंगे।

Thursday, December 18, 2008

ग्लोबल इंडिया की हकीकत....

आज भारत के प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह देशवासियों को २०२० के नए ग्लोबल भारत का सपना दिखा रहे हें। परन्तु, भारत के मौजूदा हालत की हकीकत किसी से छुपी नही हें। आज दो वक्त की रोटी के लिए मा-बाप अपनी बोचो को भी बेच देते हे, अथवा , कम उम्र से ही अपने बोचो को दुकान या सड़क के किनारे भिक मांगने के लिए भेज देते हें। ये माँ-बाप मजबूर हें, एसी जिन्दगी जीने के लिए।
भारत मैं पाचिमी ओडिशा, आंध्र- प्रदेश का तटीय प्रान्त, महारास्त्र के बिधार्ब-प्रान्त जेसे इलाके मैं भुकमरी की बजह से किसान आत्महत्या कर रहें। वजह साफ हें - कर्ज से दुबे किसान को खेती मई फसल न होना हें। दुसरे प्रान्तों का भी यही आलम हें। सरकार अपनी योजोनाओ को उपलब्धि बताती हें, परन्तु हकीकत यही हे की योजोना सफल नही हो पाई, कियु की राजनैतिक व प्रसासनिक एचा शक्ति का अभाब हें। बिधर्ब की एक कलाबती को मुआबजा देने से भाबिस्य के उज्वल भारत का गठन नही होता हें। देश मई एसी बहत कलाबती हें , जिहने रोज दो वक्त रोटी भी नसीब नही हो पति हें।
सरकार व राजनैतिक नेता संरखन की दुहाई देते हें। आज ओडिशा के दखिन-पछिम खेत्रचातिश्गद के दखिन-पूरब खेत्र झारखण्ड के दखिन खेता और उतर पूरब राज्यों जेसे आदिवासी इलाके के निवासी आज जंगल मैं, बहुत ही बुरा हाल मैजी रहे हें। उनको खाने के लिए जंगलो मैं भटकना पड़ता हें।
किसी को बीमारी होने से इलाज के लिए तंत्र- मंत्र बाबा की सहायता लेना पड़ता हें। मलेरिया, तेफेद, को देवी माँ की श्राप मानते हें। वह २१वि सताब्धि के वैज्ञानिक तकनीक की स्वास्त्या सेवा, आज भी पहुची नही हें। सबसे दूर उन वादिवासियो को संरखन की राजनीती पता नही हें। वो अपनी जिन्दगी आज भी वही पुराने तरीके से बुरे हल मैं जीते हें। यही बर्तमान भारत की हकीकत हें।
देश की पूंजीपतियों और उद्याग्पति को लाभ हुआ हें। परन्तु लोगो की हालत मैं कोई परिवर्तन नही हुआ हें। इसके बाद तो लोग विस्थापन से जूझ रहें हे और लोगो को घर, खेत को छोड़ना पड़ा। देश का आजादी के साथ साल के बाद देश की ये आलम हे, तो आप बोलिए की प्रधानमंत्री जी का २०२० का ग्लोबल इंडिया का सपना, आख़िर दस साल मैं, देश का मौजूदा स्वरुप मई बदल पाएगा ?
बिल्कुल नही , कियु की जब तक, नेता अपनी दलीय राजनीती और प्रसासनिक अधिकारी अपनी स्वार्थ से परे जाकर देश के लिए कुछ नही सोचेंगे , तब तक भारत के गणतंत्र की इस मौजूदा तस्वीर मई कोई बदलाव नही होगा।