Friday, February 19, 2010

सस्ती पब्लिसिटी

किसी ने सही कहा हैं- '' यदी किसी कलाकार और राजनेताओं को अपनी किसी चीज का प्रोमोशन हो तो, खुद को
इलट्रोनीक्स मीडिया मैं सुर्खिया मैं रखनी होगी, प्रोमोशन अपने आप हो जायेगी ''। सायद, आजकल ये हट्कंदा कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल हो रहा हैं। इस विषय को आप सस्ती पबलिसिटी कहा सकते हैं। इस सस्ती पब्लिसिटी का सबसे बड़ा माद्यम इलट्रोनीक्स मीडिया हैं । राजनेताओं चुनाव के वक्त और फिल्म स्टार आपनी फिल्म के रिलीज के वक्त, कुछ ना कुछ अपनी बयानों से सुर्ख़ियों मैं रहते हैं। हिंदी इलट्रोनीक्स मीडिया तो, इन बयानों को ब्रेकिंग न्यूज बना देती हैं।
कुछ दिनों से मुम्बई मैं, अभिनेता शाहरुख खान और शिवसेना पार्टी के विच घमासान युद्ध जारी हैं। पिछले शुक्रवार को शिवसेना की तमाम विरोध जताने बावजुद भी शाहरुख खान की फिल्म '' माई नेम इज खान '' को सफलतापूर्वक रीलिज हुई। लेकिन, इस फिल्म के लिए किंग खान को प्रोमोशन के लिए ज्यादा मसतकत नहीं करनी पड़ी। शिवसेना की भारी विरोध चलते, पिछले एक हप्तो से, यह फिल्म रीलिज होने से पहले ही सुर्ख़ियों मैं बनी हुई थी । जाहिर सी बात हैं, फिल्म प्रेमियों को फिल्म को फिल्म को देखने की इछुकता बढना लाजमी हैं। यहाँ पर, फिल्म को बैठे बैठे प्रोमोशन मिल गया। वेसे ही पब्लिसिटी का किसा ''थ्री इडियट'' फिल्म के रीलिज होने के द्वारान, इस फिल्म के लेखक चेतन भगत और फिल्म के प्रोयजक विदु विनोद चोपड़ा के विच हुई विवाद मैं, चेतन भगत को अच्छी पब्लिसिटी मिली। यह बात सच हैं कि, शिवसेना कि धमकी और गुंडागर्दी नाजाएज हैं, और
शाहरुख खान ने एसा कोई गलत बयान नही दिया, जिस से आप उनको रास्त्र विरोधी कह सकते हैं। वेसे शिवसेना ने मराठी मानुस को खुस करने के लिए जो मुहिम छेड़ी थी, उसमें व काफी हद तक सफल भी हुआ। वेसे, सस्ती पब्लिसिटी हासिल करने मैं, राजनेताओं सबसे आगे रहते हैं। देखिये ना, राहुल गांधी ने अपनी मुम्बई यात्रा द्वारान, लोगों को खुद को आम बताने की भरपूर कोशिश कि । राहुल गांधी ने खुद को आम बताने के लिए, लोकल ट्रेन मैं लोगों के साथ स्वर हुए, टिकेट काउंटर पर लोगों के साथ खड़े होकर टिकेट खारिदे और बताने कि पुरे कोशिश कि, मैं भी आप के तरह आम हूँ। यदि, राहुल गाँधी, खुद को आम मानते हैं तो लोगों को दिखाने कि किया जरुरत हैं ? परंतु, उनके मुंबई यात्रा के द्वारान, जिस तरिके कि सुरख्या किया गया था, एसा सुरक्या सायद प्रधानमंत्री जी के लिए भी नही होता होगा । एसे सुरख्या के अन्दर रह कर खुद को आम बताने से किया फाईदा ? खैर, राहुल गांधी का यह तो मिशन २०१२ के लिए तयारी हैं । राहुल गांधी ने अपनी मुम्बई यात्रा के द्वारान, अच्छी खासी पब्लिसिटी बौतरे। नेताओं को पता हैं- दूर की सोचना हैं तो तयारी अब से करलो और खुद को हमेसा सुर्ख़ियों मैं रखो । इस पब्लिसिटी पाने के लिए राजनेता किसी हद तक गिर सकते हैं। कुछ दिन पहले, कांग्रेस कि महासचिव दिगविजय सिंह ने अपनी आजमगढ़ के दौरे मैं, दिल्ली के वाटला हॉउस एन्काउंतर के फर्जी बताया और इसके न्यायिक जाँच कराने कि मांग कि । व सिधे सिधे इस एन्काउंतर मैं सहीद हुए, इंस्पेक्टर मोहन चन्द्र शर्मा कि सहादाद ऊपर सवाल उठाया । देश के लिए, इस से और किया दुर्भाग्य हो सकता हैं, इस देश कि एक रास्ट्रीय दल कि महासचिव का इस तरिके कि बयान सामने आया हैं और व दिल्ली आते आते अपनी बयान से मुकरगए।
ये फिल्म स्टार और राजनेताओं कि एसे बहत किसा आपको मिल जायेंगे, जो हमेसा ही सुर्ख़ियों से बने रहना पसंद करते हैं। इस विषय के लिए सिर्फ और सिर्फ हिंदी इलट्रोनीक्स मीडिया जिमेदार हैं। अपनी निजी काम हेतु, फिल्म स्टार और राजनेताओं इलट्रोनीक्स मीडिया मीडिया को खूब इस्तेमाल करते हैं । इलट्रोनीक्स मीडिया अपनी टी.आर.पी बढ़ने कि चकर मैं, इन सभी को अच्छी खासी पब्लिसिटी दिल्वादेते हैं। अतः इलट्रोनीक्स मीडिया को सस्ती पब्लिसिटी से दूर रहना चाहिए। परंतु, सवाल उठती हैं - क्या सस्ती पब्लिसिटी बयान देना उचित हैं, जिस से लोगों कि भावनाओं को आहात पहंचे ? क्या लोगों को भी बिना समझे नेताओं कि बातो मैं प्रभावित होना चाहिए ? ये लोकतंत्र हैं, सायद ये सवालों का जबाब भी लोगों को ही देना हैं ।

Saturday, February 6, 2010

विभाजन की राजनीति और तेलंगाना

आज आंध्र प्रदेश मैं तेलंगाना को लेकर वहां की राजनीति गरमाई हुई हैं । पहले अलग राज्य की समर्थन मैं ,अब विरुद्ध मैं विरोध प्रदर्शन और सामूहिक बंद ने, लोगों की मुसीबत बढ़ा दी हैं । खैर, आज की तेलंगना मुधा, जो स्थानीय आधार पर दिया जा रहा हैं, व एक तरफ जाएज हैं और इसमें कोई नयापन भी नही हैं । इस के लिए भारत की तात्कालिन इतिहास के ऊपर नज़र डालना होगा । आजादी के वाद से ही, अनेक राजनेताओं ने स्थानीय भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाने की कही, जो बाद मैं सफल भी हुआ । वैसे , आजादी से पहले सन १९३६ मैं, ही ओडिशा भाषा के आधार पर स्वतंत्र राज्य बन चका था । आज अनेक राज्य स्थानीय तथा खेत्रीय के आधार पर ही बतान हुआ हैं। तब स्थानीय राजनेताओं का तर्क था, स्थानीय वा भाषा के आधार पर राज्य बाँटने से स्थानीयता की पहचान बरकार रहेगी और विकाश मैं अछा मदत मिलेगी । परंतु, आज वक्त बदल चुका हैं और बदल चुका हैं , राजनीति की परिभाषा ।
समय के साथ ही , देश मैं फ्हिर अलग राज्यों के मांग तेजी से पकड़ रही हैं । बिहार को अलग करके झारखंड,
मध्य प्रदेश अलग करके छत्तिसगढ़ और उत्तर प्रदेश को अलग करके उत्तराखंड बनाने के लिए बहत पहले से मांग हो रहा था । आखिर, तत्त्कालिन वाजपयी सरकार ने नयी राज्य के लिए अमली जामा पहना दिया । उसके बाद से ही, आंध्र प्रदेश को अलग करके तेलंगना, महाराष्ट्र को अलग करके विधार्भ और प.बंगाल को अलग करके गोरखालैंड की मांग उठी। झारखंड बनाने के लिए शिबुसोरेन की झारखंड मुक्ती मोर्चा काफी दिनों से मांग कर रही थी । वेसें ही , टी.चंद्र शेखर राव ने तेलंगाना राष्ट्र समिति बना कर , हैदराबाद मैं आंदोलन चला रहे थे। वेसे तर्क यह दिया जा रहा हैं, इस से विकास की धारा आगे बढ़ेगी । यह तर्क से झारखंड की मौजुदा हालत, इस तर्क को विरोधाभास कर रही हैं ।
दश करोड़ से ऊपर आवादि वाले इस देश मैं आज गरीवी का जो चहेरा मिल रहा हैं, वाकई विकास की हकिकत को ज़ाहिर करती हैं । आजादी के बाद, इसी विकास के आधार पर विभाजित क्या गया था । परिणाम स्वरुप, देश मैं किसान आत्महत्या, गरिवी, के संख्या मैं दिन पे दिन बढ़त्तोरी और नक्सलवाद की रूप मैं उभरा हैं । नक्सलवाद भी, भारतीय आर्थिक स्थिती का एक कड़वा सच हैं । यह, सभी jअन्ते हैं , एक किसान विद्रोह से, आज भयंकर नक्सल के रूप मैं उभरा हैं । किया ये विकास की परिभाषा हैं ? क्या विकास केवल अलग तथा पृथक राज्य, विकास की परिभाषा हैं , चूँकि यह कहना गलत नहीं होगा, झारखंड और बिहार की मौजुदा स्थिती क्या हैं ? ओडिशा, छतीसगढ़ और तटीय आंध्र प्रदेश की स्थिति किया हैं ? जाहिर सी बात हैं , यह सारे सवालों की जबाब, हमारे नेताओं के पास नहीं हैं ।
दुनिया भर मैं, भारत एक विभिन्न धर्म, भाषा, और जाति होने के बावजूद, एक हैं । यह एक राष्ट्र की जीता जागता उदाहरण के रूप मैं मिसाल रहा हैं । परंतु, इन सब के आधार पर विकास होना असंभब नही, ये नामुकिन हैं ।
क्योंकि, हिस्से बटने से कभी विकास बढ़ता नही हैं, वल्कि विकास की धारा आगे वाढती हैं । उदाहरण स्वरुप, मंडल कमीशन को लागु कर के रिजर्वेसन ब्यवस्था कि गई। परंतु, आज भी उन आदिवासियों को इसका पूर्ण सफलता नहीं मिल रहा हैं , जो इसका हकदार हैं । हमारे नेता कहते हैं , बटने से विकास निरंतर होता हैं , आज यह आलम क्यों ? कोई सक नहीं, इस सारे सवाल की जवाब भी, हमारे नेताओं के पास नहीं हैं ।
अपनी स्वार्थ और महत्वकंख्या को पूरा करने हेतु , लोगों को वक्रा बना देना, यह कहाँ तक सही हैं ? वैसे, तेलंगना मुद्दे पर चंद्र शेखर राव, बहुत दिन से चुप चाप बैठे थे । व, पिछले यु.पी.ए मंत्री मंडल का हिस्सा भी बने थे । परंतु, हाल ही मैं, समाप्त हुआ विधान सभा और लोक सभा चुनाव आशानुरूप सफलता न मिलने के कारण, उनको अलग तेलंगना राज्य की ट्राम कार्ड खेलना पडा और उस मैं भी यह सफलता हुए । परंतु, रायलसीमा और तटीय आंध्र प्रदेश के विधायक और सांसद के विरोध प्रदर्शन हेतु, अब केंद्र और मुख्यमंत्री रोसैया की मुसीबत बढ़ा दिया हैं, और कोई भी हैदरावाद के तेलंगना की हिस्से मैं जाने के लिए तैयार नही हैं । क्योंकि, यदि तेलंगना राज्य बनता हैं, हैदराबाद भी तेलंगना की हिस्से मैं चला जाएगा । इसलिए , हैदराबाद को अब की चंडीगड़ की तरह बनाने की जारी हैं, फिलहाल इस के लिए कोई तैयार नहीं हैं । परंतु, यदी भविस्य मैं तेलंगना राज्य बनता हैं, हैदरावाद चार राज्यों का राजधानी बनेगा । जी हाँ, अलग तेलंगना राज्य गठन के बाद कभी भी रायलसीमा और तटीय आंध्र एक साथ नही रह पाएंगे । साथ ही , निश्चित रूप से हैदराबाद, चंडीगढ़ की तरह एक केंद्र शाशित प्रदेश बनेगा । अब हुआ ना, हैदरावाद चार राज्यों का राजधानी !
खैर, बात जो भी हो, केंद्र और आंचलिक दल, कोई भी फैसला लोगों की मत को जेहन मैं रख कर नहीं लेरहे हैं । सबको, अपनी पार्टी और खुद की राजनीति भविस्य की फिकर हैं । यह देश की भाग्य की विदवना हैं, देश की जनता, नेताओं को होता हैं । फिर भी, हम आशा करते हैं, कुछ दिन पहले बने, शांती सयुंक्त कमिति, एसा ठोस पहल करे, जिस से यह अलग राज्य की चिंगारी, आने वाले मैं दुवारा ना bha

Thursday, January 28, 2010

महंगाई के पटरी पर आम आदमी

साहाब ! मैं रिक्सा चलाता हूँ। मुझे यह एक जरिया हैं, जिस के तहत मुझे अपनी ४ सदस्य वालें घर को चलानी होती हें और यह महंगाई हमारे कमर तोड़ दी हैं । आखिर हम करे भी किया करे ? जी हाँ ! यह बात हैं , दिल्ली के महारानीवाग तथा आश्रम के सता भरत नगर के रिक्सा बालां की कहानी हैं। यह कहानी बताती हैं, केसे महंगाई, मद्यावित परिवार के लोंगो की हालत बहत नज्दुक करदिया हैं। इन दिनों सभी चीज दू- दूना भाव से अधिक दाम से मिल रहा हैं। परिणाम स्वरुप, खाना बनाने वालों दुकानदार भी दामों मैं वढ़ोतरी कर दिया हैं । अब दिल्ली मैं हर चीज महंगाई के आसमान छुं रा हैं ।
इन महंगाई से आम आदमी के अलावा स्टुडेंट भी झेल रहे हैं । क्यों की इन महाँगई से मध्यवित परिवार के स्टुडेंट को अपनी आर्थीक स्थिति से बहत तकलिप सहना पड़ रहा हैं । आम आदमी के साथ नारा देने वालें कांग्रेस और यु.पी.ए सरकार के साथ साथ दिल्ली प्रदेश शिला सरकार से तरफ भी राहत की और फल नहीं कर रहे हैं ।
चुनाव से फेले '' पालिटिकल स्टैंड'' के तहत केंद्र और दिल्ली प्रदेश के तरफ से महंगाई को रोकने के लिए जोरसोर से कोशिश किये थे। दोनों सरकार जनता से वादा किये थे, वे जल्दी ही मसले सुलझ देंगे। परंतु, हमेसा के तरह भारतीय नेता और सरकार को अपनी गढ़ी फिर मिलने के वाद , अपनी वडा भूलने का आदत हैं। केंद्र और दिल्ली प्रदेश सरकार को फिर अपनी गाड़ी मिल गया, वे तो लोगों को इस एहसान के वदले जेब करने मैं तुले हैं। वेसे, हर चीज की महंगाई से परेसान दिल्ली वासियों को पहेले बस की किराया उसके वाद मेट्रो और अब पानी की वढतोरी कीमतों ने बेहाल करदिया हैं। परंतु, इस महंगाई के वक्त भी, हमारे मंत्रीगण, अपनी सरकारी आवास छोड़कर, सरकारी पैसा से फाईफ स्टार होटल मई ठरते हैं, जिसका एक रात की किराया पांच लाख रुपया हैं । उदाहरण स्वरुप, विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा जी ने , एक फाईफ स्टार होटल मैं एक महीने तक ठरते थे। यदी, राजनैतिक नज़रों से कहा जाए, यह नौवत लगातार जनाधार की परिणाम हैं । यानी, किसी भी दल को कभी भी लगातार गढ़ी सोपना नही चाहिए । यदी, एसा करते हैं, दोलों मैं स्वेछाचार आजेयेगी और अपनी मनमानी पर उतर आयेगें । परिणाम आपके सामने हैं । जनता हमेसा नेताओं को यह येहेसास दिलाना जरुरी हैं, अछा काम कोरोगे हमारे साथ पाओंगे। खैर, यह भारतीय जनता हैं, जो भले hiइ कितने तकलिप सहें, परंतु नेताओं की मीठी वातों से सबकुछ भुल्जाते हैं । फिलहाल तो महंगाई की मार से दिल्ली वासियों को कोई राहत मिलने वालां नहीं हैं । इस से राहत पाने के लिए , वेसक दिल्ली वासियों को २०१२ तक इंतजार करना पडेगा। क्यों की, २०१२ मैं आम चुनाव हैं, जाहिर हैं, चुनाव के मधेनाजर वादों की पितारों से आकर केंद्र और प्रदेश सरकार महंगाई को रोकने के लिए कोशिश करेंगे।
इसलिए -
'' करते रही हैं , २०१२ तक की इंतजार,
झेलते रही हैं, महंगाई की मार '' ।

Thursday, December 31, 2009

राजनैतिक झलक- २००९

२००९ के सुरुवात से ही पूरे देश मै चुनाव को लेकर, राजनीति गहमागहमी रहीं । पूर्ब चुनाव कमिशनर टी.कृष्णमूर्ती का अब के चुनाव कमिशनर नवीन चावला के ऊपर कथित पख्यापात का आरोप लगाने साथ ही महामहिम राष्ट्रपति को हटाने के लिए पत्र लिखना , देश की चुनाव के इतिहास मैं पहली वार हुआ, जो चनाव के स्वच्छता के ऊपर फिर से सवाल खडी किया । फिर भी, आगे नवीन चावला के नेतृत्व मैं देश और तीन राज्यों के चुनाव सुचारू रूप से समपर्ण हुआ। लोक सभा चुनाव मैं , डॉ.मनमोहन सिंग कांग्रेस तथा यु .पी.ए फिर से गडीपाने मैं कामियाब हुए । वेसे ही, ओड़िसा मैं नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश मैं स्वर्गीय राज शेखर रेडी और सिकिम मैं, दोरोजी कुंडू फिर से सता के मलाई चखने के लिए कामियाब मिला । इस लोक सभा चुनाव मैं, पहली वार मीरा कुमार के रूप मैं लोक सभा की प्रथम महिला वाचस्पती बनी। पूर्ब आ.ई.ऍफ़.एस ऑफीसर मीरा कुमार बिहार के सासाराम संसदीय खेत्र से प्रतिनिधित्व करते हें और व बिहार के पूर्ब मुख्यमंत्री जगतजीवनराम के पुत्री
इस साल की चुनाव मै सब से जादा ५५ महिला संसाद के रूप मै चुनाव जीत कर संसद पहंचे। जिस से ठंडे बस्ते मै पड़ी, ''महिला रेजर्वेसन'' विल को फिर से जान मिल गया। उमीद के मुताविक, सरकार संसद मैं ''महिला रेजर्वेसन'' को पेश किया । जिस को जद (यू) , समाजवादी पार्टी और लालु जी की आर.जे.डी इस वील को विरोध किया, जब की बाक़ी दल ने इस विल को सहमति जताई । इस के लिए , संसद मैं कुछ दिन सोरसरवा भी हुआ। इस साल की राजनीतिक इतिहास मै एक दुखद घटना भी घटी। आंध्र प्रदेश के पूर्ब मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजशेखर रेडी एक हेलिकेप्तर हादसा मैं मौत होगया। वास्तब मैं, यह एक बहत ही दुखद घटना था । इस के साथ ही, प.बंगाल मैं के लाल गढ़ मैं माओवादियों की हिंसा और भुबनेश्वर राजधानी को अगवा करना, बंगाल मैं कम्युनिस्ट सरकार का कोमजोरी कड़ी को सब के सामने लेआया। वेसे ही, ओड़िसा मैं विधान सभा के एक दीन बढाकर
जल्दवाजी मैं ''विश्वविद्यालय विल'' को परीत करना भी राजनैतिक खबरों मैं सुर्खिया बनी ।
पूर्ब केंद्रमंत्री जसवंत सिंह को अपनी अपती जनक तिपनी के लिए भाजपा से हटाना और आर.एस.एस का नयी युवाओं के हाथों मैं, भाजपा की स्टीयरिंग दिलाने ले लिए आडवानी और राजनाथ सिंह को अपने पद से इस्ताफा देना भी राजनीती गरमा रखा । संसद और देश के विभीन्न प्रदेशों की विधान सभा मैं महंगाई को लेकर सदन की कार्य मैं वार वार रुकावट बनी । जब की महारास्त्र के विधान सभा चुनाव मैं कांग्रेस-एन.सी.पी गठ्वंधन को फिर से बहुमत मिली और राज ठाकरे की एम्.एन.एस ने शिवसेना-भाजपा गठ्वंधन की वोट बैंक मैं सेंध मारकर अपनी जीत का परचम लहराया। वेसे ही ओड़िसा मैं खान की घोटला से परेसान ओड़िसा सरकार सदन की कार्य पूरे होने से १५ दिन पहले ही सदन को स्थगित करना और इस के विरुद्ध मैं ''प्रतीक विधानसभा'' चलना वाकई राजनैतिक पंडितों को हैरान करदिया। साथ ही, १७ साल वाद , संसद मैं लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पेश करना, विपख्य के विरोध हेतु, संसद की कार्य मैं वार वार वाधा उपजी और सदन को वार वार मूल तबी किया गया । इस के अलावा, तेलंगाना राज्य गठन karne के लिए, हैदरावाद मैं अनसन करना और उस के वाद केंद्र के तरफ से हरी झंडी दिखाना, आन्ध्र के राजनैतिक माहोल मैं भूचाल लाया । केंद्र की इस फैसला को रायलसीमा और तटीय आंध्र के सभी संसद और विधायक सामूहिक त्यागपत्र देना, प्रदेश की राजनीति गर्माया । गौरतलब हें, यदी तेलंगाना गठन होता हें, हैदरावाद तेलंगाना की हिस्से मैं चलाजायेगा। जिस को रायलसीमा और तटीय आन्ध्र के नेता विरोध कर रहे हें । वहाँ, अब भी स्तिथी मैं सुधर नही हुआ हें । इस इस साल के आखिर मैं, वीजेपी की वागदौर राजनाथ के बदले नागपुर के नितीन गडकरी ने कमान संभाली, जब की विपख के नेता के रूप मैं आडवानी के बदले दिल्ली के सुषमा सवराज संभाली। जब की दल के संम्भिधान मैं एक संसोधन लाकर अडवानी को भाजपा संसदीय दल के नेता और यू.पी.ए तरह एनडीए की कमान आडवानी के हाथो थमाई गयी। एन.डी.ए की संजोजक के रूप मैं जेडयू के सरद यादव बनाया गया, जॉब की राज्य सभा मैं विपख्य नेता अरुण जेटली को नही बदला गया।
इस साल की राजनैतिक आकाश मैं उजाला और अन्धेरा के विच खूब छुपा रुस्तम खेला गया । यह आगे और बढ़ने की संम्भावना हें । कियों की, अब झारखण्ड की चनाव परिणाम आचुकी हें, और इस से सुरु होगी राजनीति काउनडाउन - २०१० । इस के अलावा, तेलंगाना मुधा , लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट, २०१० की राजनीति को पूरा गरम रखेगी। जब की, महिला रेजर्वेसन विल के ऊपर गिरिजा ब्यास कमीटी की रिपोर्ट और अल्पसंख्यक को रेसेरवेसन देना जेसे विषय नयी साल की राजनीति की तापमान ऊपर रहेगा । इस के अलावा, विपख्य के नयी नेत्री और भाजपा के नया प्रमुख के कामकाज केसा रहेगा, यह देखनेलायक होगी । खैर, बात जो भी हो , हम तो यह आशा करते हें, इस सारे समस्याओं का जल्द से जल्द समाधान हो । परन्तु , यह आशा करना बेबकुफ़ी होगी, नयी साल की राजनैतिक तापमान, इस साल की राजनैतिक तापमान से कम होगी ।


Friday, November 27, 2009













''हे मेरे वतन के लोगों , जरा याद करो कुरुवानी'' ..... लता मंगेशकर जी की स्वर से आवाज जुनजती, ये गीत सुन कर हर भारतीयों की धड़कन रुक जाती हें । कियों की , ये गीत उन सहीद जवानों को स्रधान्जली हें, जो ख़ुद की जान की फिक्र नही करते हुए , देश की रख्या के लिए कुर्वान करते हें । आज से ठीक एक साल पहेले, २६ नवम्बर को आतंकियों ने देश की वाणिज्य सहर मुंबई पर अचानक हमला कर दिया । दर्शोदों ने मुंबई के ताज होटल , ओबरै होटल , नारिनाम हाउस, वि.टी.स्टेसन और सी.एस.टी.सी स्टेसन पर हमला कर अंधा धुन गोली चलाई । इस मैं अनेक निहत होने के साथ साथ अनेक गंभीर रूप से घायल भी हुए । इस द्वारान , अनेक लोग अपनी जान को दाँव पर लगा कर दुसरे की जान बचाई । परन्तु , इन आतंकियों हमला मैं , अपनी वीर पुत्रों को भी खोया । हमले मैं , मेजर .उनी कृष्णन , मुंबई ए.टी.एस की चीफ - हेमंत कलकारे, जोइंट पालिश कमिशनर-अशोक आम्पते और एन्कोउन्टर स्पेसिअलिस्ट विजय सालेस्कर सहीद हुए । वाकई, इस आतंकियों घटना दर्दनाक और भयानक हें। हम एक हें और हम साथ साथ हें , यह हमारे देश की ताकत हें और कोई हमारे अस्मियता के ऊपर कितना भी आंच आने की कोशिश करे , वे कभी भी सफल नही होंगे । जब तक, हमारे वीर जवान देश के लिए सुरख्या कवच हें , जब तक हम जाती, वर्ण , धर्म और भाषा जेसे अनेक विभेदाओं के विच एक हें , तब तक कोई भी हमें कुछ कर नही कर सकता ।

Saturday, November 7, 2009

आफत मैं हें देश की भी.भी.आई.पि ट्रेन.....











२७ ओक्टोबर २००९ का दिन भारतीय रेलवे के लिए एक काला दिन था और ट्रेनों मैं सफर करने वाले यात्रियों के लिए एक दर्दनाक और दुखद दिन था । कियों की उस दिन , दोहपर मैं , नक्सलियों के द्वारा भुबनेश्वर से दिलली के लिए जाने रही २४४३ ए भुबनेश्वर राजधानी ( भाया- टाटा नगर जं ) समर स्पेशल को बनषताला मैं अगवा करलिया गया था । इस स्टेसन झारग्राम स्टेसन से १० किलोमीटर के दुरी पर हें । झारग्राम स्टेसन, खड़गपुर जं - टाटा नगर जं के विच मैं पड़ता हें । इस ट्रेन मैं लगभग १२०० यात्री सवार थे । जब ट्रेन बनषताला स्टेसन के आउट डोर सिग्नल पारी कर रहा था , तब किसी ने लाल झंडे देखा कर ट्रेन को रोक दी । चालक ने भी , ऐमरजेंसी ब्रेक लगा दी । ट्रेन रोकते ही , छुपे हुए , ६०० नक्सलियों ने ट्रेन को घेर लिया ट्रेन के चालक को अपने कब्जे मैं ले लिया और सभी यात्रीयों को तत्काल उतारने के लिए बोल कर, ट्रेन की विजली कनेक्सन काट दी । उसके वाद , नक्सलियों ने ट्रेन की फर्स्ट एसी ( भी .भी .आई .पी. कोच ) मैं तोड़ फोड़ किया । नक्सलियों ने ट्रेन वगियों के ऊपर उनके नेता छ्त्रधर महतो को तत्काल जेल से रिहा करने की मांग के वारे मैं लिखा । सबसे पहले तो, नक्सलियों ने ट्रेन के दोनों चालक आनन्द राव और के.स .राव को अपने कब्जे मैं लेकर, उन दोनों के माद्यम से रेलवे के वरिस्थ अधीकारियों से बातचीत किया । उसके बाद , प.बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भटाचार्य और बाद मैं , रेल मंत्री ममता वानार्जी से बात करके , उनके नेता छ्त्रधर महतो को तुंरत छोड़ने की मांग किया । स्याम होते ही और सी.आर.ऍफ़ वल आने से पहेले , नक्सलियों ने ट्रेन और चालक को मुक्त कर के घटना स्थल से भाग निकलने मैं कामियाब रहे । उसके वाद , सम्पूर्ण रूप से जाँच परताल करके ट्रेन को रात करीब ८ बजे सी.आर.ऍफ़ की निगरानी मैं दिल्ली के लिए रवाना किया गया । वेसे, नक्सलियों ने यात्रीयों को कोई नुक्सान नही पहंचाया ।
परन्तु , भुबनेश्वर राजधानी को दिन दाहादे अगवा करना, यह बात ट्रेन मैं सवारी करने वालें यात्री कितना सुरखित वह पता चलता हें । यह आलम राजधानी जेसे भी.भी.आई.पी ट्रेन का हाल हें , आप सोचिये दुसरे आम ट्रेनों मैं सुरख्या का किया इंतजाम हुआ होगा । भुबनेश्वर राजधानी को हाईजेक करना पुरा प्री-प्लान था। कियों की , नक्सलियों ने ट्रेन को आउट डोर सिग्नाल मैं रोक देना और निर्भय से ट्रेन को घेर लेना । कियों की , नक्सलियों को यह भी पता था , उस दिन ट्रेन मैं कोई सुरख्या कर्मी मजूद ही नही थे और नक्सलियों के नेता संतोष पात्रा ने मीडिया को भुबनेश्वर राजधानी की अगवा के वारे मै बताना आदी सारे बात साफ़ इंगित करता हें , नक्सलियों की यह पूरा प्री-प्लान था और उनको ट्रेन की वारे मैं पल पल की ख़बर पता था । रेलवे और सरकार जितने भी दाबे करे, हर वक्त नक्सलियों ने सुरख्या की पोल खुलते हें । जब करवाई किया जाता हें , तब तक नक्सलियों के द्वारा घटना को अंजाम दिया जुका होता हें । वेसे , भुबनेश्वर राजधानी को अपहरण करना , नक्सलियों की एक पब्लिसिटी स्टांड भी था ।
सरकार और नक्सलियों के विच आम जनता फस जाते हें और आखिर उनोको ही परीसान झेलना पड़ता हें । हर घटना के बाद , कुछ जोरदार कारवाई किया जाता हें , उसके बाद वही पुरानी कहानी । आखिर, केन्द्र और राज्यों सरकार क्यों कड़े कदम नही उठाते हें ? क्यों हम हर वक्त लाचार हो जाते हें ? मंत्री , विधायक , एम्.पी , नेता तो जेड़ सीक्युरिटी के अन्दर रहेते हें , उनको पता नही लोग रोज किस तरीके से समस्याओं को झेलते हें । दिमाग हर पल डर बेठता हें , आज कुछ ना हो जाए । इधर केन्द्र ने राज्यों को और राज्यों ने केन्द्र को आपसे कीचड़ फेंक कर अपने जिमीदारी से पला झाद्लेते हें । इधर , सी .आर .पी. असली नक्सलियों को पकड़ने बदले निर्दोस आदिवासियों को पकड़ लेते हें , जिस का परिणाम सबको भुगतना पड़ता हें । इस बात को नक्सलियों के द्वारा आदिवासियों को सरकार के खिलाप मोर्चे मैं सामिल कर के फाईदा उठाते हें । जाहिर हे, आदिवासी नक्सलियों के साथ ही देंगे । साथ ही साथ , नक्सलियों के द्वारा लोगो को हर चीज मुहया करते हें , सरकार की मदत से मायूस आदिवासी नक्सलियों के साथ देते हें । राज्यों के पोलिस का बात ही मत कीजिये । कियों की , सारे के सारे भ्रस्ताचार मैं पि.च .दी. हें । लोग को इस तरीके से लुटते हें , जिस से लोग पोलिस से परिसान होकर नक्सलियों के साथ देते हें । हम नक्सलियों को कुसूरवार ठरना जायज हें, परन्तु उस से पहेले , ख़ुद देखिये हम कितने पानी मैं हें ? हमारे सीस्टम की भ्रस्त चीज को नक्सलियों ने उनके लिए इस्तमाल करते हें । बात यह हुआ , खुट तो हमारे विच हें । यदी , तत्काल समय मैं , पोलिस भ्रस्त ना होता , ना सरकार चैन की नींद सोता , तब आज यही नक्सलियों की भयानक परिणाम देखना ना पड़ता । आखिर , एक ग़लती से ही आनेवाले वक्त मै भारी पड़ता हें । अभी भी कुछ बदला नही , यदी सरकार चाहेगी हालत सुधर सकते हें । परन्तु, मुझे भी पता हें और आप को भी पता हें , यह भारत हें जी , यहाँ के नेता ,मंत्री, सरकार और प्रशासन कभी अपनी गलतिया मानते नही , भले ही लोगों की जाने जाए । उनका किया जाता हे भाई, वह तो चबिसो घंटा जेड़ सुरक्या अन्दर रहेते हें । उनका थोड़े ही कुछ होने वाले हें । जो भी , यह बात साफ़ हें , जब तक नेता , मंत्री , सरकार और प्रशासन भ्रस्ताचार से मुक्त नही होंगे , जब तक यह सारे आपनी दईत्व को ठीक से नही निभाएंगे , तब तक नक्सलवादियों, माओवादियों के साथ साथ आतंकवादियों को भी ख़त्म कर नही सकते .....

Friday, November 6, 2009

पंजे का परचम......

आम चुनाव मैं जीत की खुशी का खुमार अभी कम नही हुआ था कि तिन राज्यों मैं हुए विधानसभा चुनाव मैं कांग्रेस का विजय- ध्वजा एक वार फ़िर लहराया । लोकसभा चुनाव के बाद एक बार फ़िर अरुणाचल प्रदेश , हरियाणा और महाराष्ट्र मैं कांग्रस के पख्य मैं इस कदर झूमकर बयार बही कि मतदाताओं ने तिनं पूर्ब मुख्यमंत्रियों को ही सूबे की सिंहासन पर पुनः स्थापित कर दिया । अरुणाचल प्रदेश मैं दोरजी खांडू, हरियाणा मैं भूपेंद्र सिंह हुडा, महारष्ट्र मैं अशोक चह्वाण के सिर पर फ़िर ताज बंध गया ।
इन चुनाव के परिणाम जो भी हो , एक वार फ़िर साबित होगया, विभिन्न घटना क्रम और आरोप-प्रत्यारोप के बाबजूद , जनता फिलहाल तो हाथ के साथ नज़र आरहा हें । अरुणाचल प्रदेश मैं चीन की चिकचिक का मुहं तोड़ जबाब देते हुए , चौथी वार कांग्रस के दोरजी खांडू को सता की चाबी थमाई । जब की महाराष्ट्र मैं भोट प्रतिसत कम होने की बाबजूद, जनता ने कांग्रस -रांकपा गठवधन को बहुमत देने साथ ही , कांग्रस के अशोक चह्वाण को फ़िर से दुवारा सता की मलाई चखाया । वेसे ही , हरियाणा मैं, कांग्रस को पिछले चुनाव मैं भले ही कम सीटें मिले , परन्तु कांग्रेस के भूपिंदर सिंह हुडा ने फ़िर से गडी पाने मैं कामियाब रहे । हरियाणा मैं यह पहली वार हुआ , किसी वक्ती को लगातार दूसरी वार सत्ता नशीब हुआ । इन तिन विधानसभा चुनाव मैं, कांग्रस ने लोकसभा चुनाव मैं मिली जित को दोहराया, जब की भाजपा को फ़िर हार की मुहं खाना पडा । इन विधानसभा चुनाव मैं , भाजपा को मिली हार के वाद, फ़िर से पार्टी के अन्दर नेतृत्व परिवर्तन को लेकर घमासान तेज होगया हें । पहली से ही , राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तरफ से भाजपा के ऊपर आडवानी और राजनाथ सिंह को हटाने के लिए दवाब हें । अब मिली हार से , फ़िर पार्टी के अन्दर कुर्सी को लेकर घमासान होना लाजमी हें ।
तिन विधानसभा चुनाव मैं एक बात गौर करनेवाला था - छोटे दोलों की सीट दर्ज करना । कियों की , महाराष्ट्र मैं , राज ठाकरे की नव निर्माण सेना (मनसे) ने १३ सीटों पर जित दर्ज की । जब कि , मनसे ने शिवसेना -भाजपा गठवधन को ४० सीटों से अधिक सिट पर नुक्सान पहंचाया । जिसका फाईदा सीधे
कांग्रस-रांकपा गठवधन को हुआ । वेसे ही , अरुणाचल प्रदेश मैं , रेल मंत्री ममता वानार्जी की त्रूलमूल कांग्रस पार्टी ने चुनाव मैं मैं कूद कर ५ सीटों पर वाजी मार ली । सायद यह पहला मौका हें , ममता वानार्जी की पार्टी को अपनी राज्य प.बंगाल के वाहर , किसी राज्यों मैं शानदार जित मिला । ये बात, कांग्रेस को थोड़ा सोचना चाहिए ।
चुनाव परिणाम जो भी हो , यह चुनाव कांग्रस की '' विजन फॉर राहुल ताजपोशी- २०१२ '' के लिए अच्छी ख़बर हें । इन दिनों समय और भाग्य कांग्रस के साथ हेतु , पिछ्ले लोकसभा चुनाव और मौजूदा संपर्ण हुए विधानसभा चुनाव मैं सबसे ज्यादा कांग्रेस को फाईदा मिला । इसलिए , कांग्रसियों ने फ़िर आश लगा कर बेठें हें , आगे फ़िर कांगेस की पुरानी '' गांधी-गोल्डन पीरियड '' वापस आजायेगा । फिलहाल कांग्रस ये कोशिश मैं हें , अपितु इन दिनों मिल रहीं सफलता की वलबूते पर आनेवाले लोकसभा चुनाव मैं , पुनः पंजे का परचम लहरा सके ।