Saturday, February 27, 2010

आमार रेलवे.....

आमार रेलवे की ये शीर्षक को पढ़ कर , पाठक यदि असमंजस मैं मत रहिये, जी हाँ , प्रधानमंत्री डॉ .मनमोहन सिंह की विभागों का बाँटने के वाद , पश्चिम बंगाल की त्रुलमूल कांग्रेस की नेत्री ममता वानार्जी को रेल विभाग मिलने के बाद , ये ही लग रा हें । ममता दीदी , इस साल संसद पेस किये गए रेलवे बजट मैं ज्यादातर पर्योजोनाएं सिर्फ और सिर्फ प.बंगाल के लिए ही था । ममता दीदी की २०११ मै , पश्चिम बंगाल मै होने वाले विधान सभा चुनाब के लिए , एक पालिटिकल स्टांड हें । परंतु यहाँ पर ये सवाल उठता हैं , रेल विभाग जेसे महत्वपूर्ण विभाग की आन्चालिककरण करना क्या सही हें ? फ़िर से, राजनैतिक फाईदा के लिए, रेल विभाग का राजनैतिककरण तो नहीं हो रा हैं ? ''आमार बांग्ला '' के नाम पर ममता वानार्जी रेल विभाग को पुरे तरह से , पश्चिम बंगाल के अंदर , आपनी राजनैतिक फाईदा के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं । ये सभी का जबाब जो भी हो , सच ये ही हैं , आज की वक्त मैं, आंचलिकतावाद, अब सरकारी विभाग को भी चपेट मै ले चुका हैं । इस मैं कोई दोहराई नहीं , ममता वानार्जी के वाद , अगले रेल मंत्री नई दिल्ली के बदले अपनी राज्य के किसी रेल जोंन मै काम काज करेंगे । तो, दिल्ली मैं रेल विभाग का हेड आफिस रहेने का कोई मतलब ही नहीं हैं । आज ये आन्चालिक्तावाद भयंकर रूप ले चुका हैं । महाराष्ट्र मै उत्तर भारतीय के खिलाप विश के विज बुना जा रहा हें , तामिलनाडू मैं हिन्दी भाषी लोगो के खिलाप अपनी जहर उगालते हें । यदि , आज तत्कालीन उप- प्रधानमन्त्री वलभ भाई पटेल होते , उनको जरुर ठेस पहंचता । कियों की, व बिखरते भारत को एक करने के मैं उनका योगदान, आज ब्यर्थ हो गया । आज की नेता , अपनी स्वार्थ के लिए , ये आन्चिलिक्बाद का जहर , जो लोग के मन मै फेला कर फाईदा उठाते हें । हम , उनके ताल मै ताल मिला कर हाँ भरते हें । भारत मै , संभिधान को लागू करने के वक्त कहा गया था, भारत अनेक धर्म , अनेक भाषा और अनेक जाती के बाबजूद भारत एक हें । फ़िर , आज हमारे विच आपसी द्वेष कियों ? आजादी से पहले , कभी एसा हुआ था, ना आजादी के वाद कभी हुआ हें । ये कुछ साल की अन्दर , हमारे अन्दर दुसरे की प्रती इतने नफरत कियों ?
आज ममता वानार्जी की पहल पर भले ही कोई विरोध ना करे , यदि कल दुसरे नेता एसे करते , निश्चित रूप से विरोध होगा । नेताओं को अपनी मौजूदा फाईदा से जुड़े कोई बड़े कदम उठाने से पहेले , इस का भविष्य परिणाम के वारे मैं जरुर सोचना चाहिए । इसलिए , ममता वानार्जी को ''भारतीय रेल'' को , अपनी राजनैतिक फाईदा के लिए , ''बांगला रेल '' की सकल देना ठीक नही हें ।

Friday, February 26, 2010

ममता सुपरफर्स्ट एक्सप्रेस, ( भाया- बंगाल की सी.एम्. कुर्सी )

रेल मंत्री ममता वानार्जी ने २०११ वर्ष के लिए लोकसभा मैं रेल बजट पेश की। जेसे पहेले से ही कयास लगाया जा रहा था, वेसे ही रही ममता दीदी की रेल बजट पेश की। २०११ मैं प.बंगाल मैं होने वाले विधान सभा चुनाव को देखते हुए, अपनी बजट मैं बंगाल के लिए अपनी ममता वौर्छार की । जादातर परयोजनाए बंगाल के लिए था । अपनी चुनावी बजट मैं , दीदी ने यात्री दर मैं कोई वाधोतोरी नहीं की और इ.टिकट मैं लगने वाले सरप्लस चार्ज ४० रुपए से २० रुपए घटा दिए । इस के साथ ही, ममता दीदी ने साफ़ करदिया रेलवे का निजीकरण नहीं होगी और साथ ही एलान की - दिल्ली मैं होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों मैं भारतीय रेल अग्रणी साझीदार और खेल के द्वाराण विश्वश रेल गाड़ियों को चला जायेगी। ममता वानार्जी ने इस वार सुरख्या की ख़ास द्यान रखी। देश के सभी बड़े सहारों मैं महिला स्पेशल चलाने की घोषणा की । साथ ही, अब पूर्व सैनिकों को आर.पी.ऍफ़ मैं भर्ती किया जाएगा। इसके अलावा, रेल मंत्री की घोषणाओं मैं - आम लोगों के सौहलियत के लिए, अब रेलवे की परिखियाए इंग्लिश-हिंदी के साथ साथ उर्धू और सभी आंचलिक भाषाओँ मैं होना, कुलियों और वेंडोर के लिए स्वास्थ सेवा, शौचालय को और आधुनिक किये जायेंगे, मोबाईल वेंन मैं टिकट चालु करना, विश्वविद्यालय मैं टिकट काउंटर खोलना, भर्ती नीति और कैटरिंग नीति मैं बदलाब, जमीन अधिकरण के बदले नौकरी, निवेशकों को रेलवे मैं निवेश करने का मौका देना, पीपीपी से छ सहोरों मैं पानी के प्लांट की स्थापना आदी प्रमुख थी। पिछले साल की तरह, इस साल भी रेल मंत्री ने पुरे देश मैं ५४ नई ट्रेन और मुंबई के लिए १०१ नई लोकल ट्रेन चलाने की घोषणा की। साथ ही, उह्नोने २०१५ तक पांच हजार नई रेल लाइन बिछाना और बांग्लादेश के साथ लिंक रेल की वारे मैं कही । इस के अलावा, खाद्य पदार्थ और किरोसिन की धुलाई मैं सब्सीडी, प्रेस संवादाताओं के बचों को ट्रेन की सफ़र मैं छुट और संसाधन जुटाने के लिए नए रास्ते तलाशने की भी रेल मंत्री ने सदन मैं कही। मौते दौर पर, ममता वानार्जी ने, अपनी रेल वाजत मैं चुनावी रंग देने की पुरजोर कोशिश की। ममता दीदी की ये चुनावी एक्सप्रेस उनको चुनाव जिताने मैं कितना मदतगार होगी, व तो आनेवाला वक्त बताएगा। परन्तु, ये जरुर कहा जा सकता हैं, आहिस्ता आहिस्ता रेलवे के जरिये सिर्फ एक खेत्रिय इलाका के लिए पूरा युपयोग होरा हैं। हमें ये कभी भूलना नही चाहिए, रेलवे किसी एक खेत्रिय जगह की नही वाल्की ये सारा देश की हैं ।

Thursday, February 25, 2010

सचिन तुझे सलाम.....

सचिन रमेश तेंदुलकर का नाम क्रिकेट की जगत मैं भगवान् की दर्जा हैं और व भगवान् कल गवालियर मैं साबित करदिया, उनको कियों भगवान् कहा जाता हैं। सचिन ने कल गवालियर मैं हुए दुसरे एकदिवसीय मैं द.अफ्रिका के विरुद्ध अपनी जीवन के सर्बश्रेष्ठ पारी खेलते हुए, एकदिवसीय मैच मैं किसी वक्तिगत सबसे जादा रन बनाने वाले खिलाड़ी बनगए। सचिन ने १४७ गेंद और २५ चौके, छक्के के मदत से २०० रन बना डाले। रेकड़ के रेकड़ की सीडियों के ऊपर चढ़ने वाले सचिन तेंदुलकर जब ये कीर्तिमान मान स्थापित किया, तब सारा देश की क्रिकेट प्रेमी ख़ुशी से झूम पड़े और पटाके, आतास्वादी से अपनी खुसी जाहिर की। सायद, सचिन की रेकड़ किसी देश के लिए उतना गर्व होता हैं। अपनी क्रिकेट मैं अपनी २१ साल बिता चुके सचिन ने, ग्वालियर मैं जिस तरीके से द.अफ्रिका के हर बोलर के हर गेंद को जिस तरीके से बखिया उखाड़ी, इस से देख कर कयास लगाना, वेबकूफी होगा की, सचिन की रन बनाने की भूखा पेट २१ साल के बाद भी थम गया। सचिन ने इस पारी से ना सिर्फ युवा खिलाड़ियों के लिए एक नया मिसाल पेस किया, व ये भी प्रमाणित किया, आखिर उनको कियों मास्टर ब्लास्टर कहा जाता हैं। हमेसा, खुद को एक निर्वादित और विनम्रता की छवि मैं रखने वाले सचिन ने, अपनी अपनी जीवन की इस बेहतरीन पारी को देशवासियों को समर्पित किया, जिह्नोने पिछले २० वर्षों से ढेर सारा प्यार और समर्थन दिया हैं । सचिन की इस पारी को जितनी तारीफ़ किया जाये, उतनी ही कम होगी। अपनी गोल को खुद तय करने वालें सचिन तेंदुलकर को हमारा सलाम और हम भगवान् के सरन मैं ये ही दुआ मांगते हैं- सचिन तुम जियो हजारों साल।

Friday, February 19, 2010

सस्ती पब्लिसिटी

किसी ने सही कहा हैं- '' यदी किसी कलाकार और राजनेताओं को अपनी किसी चीज का प्रोमोशन हो तो, खुद को
इलट्रोनीक्स मीडिया मैं सुर्खिया मैं रखनी होगी, प्रोमोशन अपने आप हो जायेगी ''। सायद, आजकल ये हट्कंदा कुछ ज्यादा ही इस्तेमाल हो रहा हैं। इस विषय को आप सस्ती पबलिसिटी कहा सकते हैं। इस सस्ती पब्लिसिटी का सबसे बड़ा माद्यम इलट्रोनीक्स मीडिया हैं । राजनेताओं चुनाव के वक्त और फिल्म स्टार आपनी फिल्म के रिलीज के वक्त, कुछ ना कुछ अपनी बयानों से सुर्ख़ियों मैं रहते हैं। हिंदी इलट्रोनीक्स मीडिया तो, इन बयानों को ब्रेकिंग न्यूज बना देती हैं।
कुछ दिनों से मुम्बई मैं, अभिनेता शाहरुख खान और शिवसेना पार्टी के विच घमासान युद्ध जारी हैं। पिछले शुक्रवार को शिवसेना की तमाम विरोध जताने बावजुद भी शाहरुख खान की फिल्म '' माई नेम इज खान '' को सफलतापूर्वक रीलिज हुई। लेकिन, इस फिल्म के लिए किंग खान को प्रोमोशन के लिए ज्यादा मसतकत नहीं करनी पड़ी। शिवसेना की भारी विरोध चलते, पिछले एक हप्तो से, यह फिल्म रीलिज होने से पहले ही सुर्ख़ियों मैं बनी हुई थी । जाहिर सी बात हैं, फिल्म प्रेमियों को फिल्म को फिल्म को देखने की इछुकता बढना लाजमी हैं। यहाँ पर, फिल्म को बैठे बैठे प्रोमोशन मिल गया। वेसे ही पब्लिसिटी का किसा ''थ्री इडियट'' फिल्म के रीलिज होने के द्वारान, इस फिल्म के लेखक चेतन भगत और फिल्म के प्रोयजक विदु विनोद चोपड़ा के विच हुई विवाद मैं, चेतन भगत को अच्छी पब्लिसिटी मिली। यह बात सच हैं कि, शिवसेना कि धमकी और गुंडागर्दी नाजाएज हैं, और
शाहरुख खान ने एसा कोई गलत बयान नही दिया, जिस से आप उनको रास्त्र विरोधी कह सकते हैं। वेसे शिवसेना ने मराठी मानुस को खुस करने के लिए जो मुहिम छेड़ी थी, उसमें व काफी हद तक सफल भी हुआ। वेसे, सस्ती पब्लिसिटी हासिल करने मैं, राजनेताओं सबसे आगे रहते हैं। देखिये ना, राहुल गांधी ने अपनी मुम्बई यात्रा द्वारान, लोगों को खुद को आम बताने की भरपूर कोशिश कि । राहुल गांधी ने खुद को आम बताने के लिए, लोकल ट्रेन मैं लोगों के साथ स्वर हुए, टिकेट काउंटर पर लोगों के साथ खड़े होकर टिकेट खारिदे और बताने कि पुरे कोशिश कि, मैं भी आप के तरह आम हूँ। यदि, राहुल गाँधी, खुद को आम मानते हैं तो लोगों को दिखाने कि किया जरुरत हैं ? परंतु, उनके मुंबई यात्रा के द्वारान, जिस तरिके कि सुरख्या किया गया था, एसा सुरक्या सायद प्रधानमंत्री जी के लिए भी नही होता होगा । एसे सुरख्या के अन्दर रह कर खुद को आम बताने से किया फाईदा ? खैर, राहुल गांधी का यह तो मिशन २०१२ के लिए तयारी हैं । राहुल गांधी ने अपनी मुम्बई यात्रा के द्वारान, अच्छी खासी पब्लिसिटी बौतरे। नेताओं को पता हैं- दूर की सोचना हैं तो तयारी अब से करलो और खुद को हमेसा सुर्ख़ियों मैं रखो । इस पब्लिसिटी पाने के लिए राजनेता किसी हद तक गिर सकते हैं। कुछ दिन पहले, कांग्रेस कि महासचिव दिगविजय सिंह ने अपनी आजमगढ़ के दौरे मैं, दिल्ली के वाटला हॉउस एन्काउंतर के फर्जी बताया और इसके न्यायिक जाँच कराने कि मांग कि । व सिधे सिधे इस एन्काउंतर मैं सहीद हुए, इंस्पेक्टर मोहन चन्द्र शर्मा कि सहादाद ऊपर सवाल उठाया । देश के लिए, इस से और किया दुर्भाग्य हो सकता हैं, इस देश कि एक रास्ट्रीय दल कि महासचिव का इस तरिके कि बयान सामने आया हैं और व दिल्ली आते आते अपनी बयान से मुकरगए।
ये फिल्म स्टार और राजनेताओं कि एसे बहत किसा आपको मिल जायेंगे, जो हमेसा ही सुर्ख़ियों से बने रहना पसंद करते हैं। इस विषय के लिए सिर्फ और सिर्फ हिंदी इलट्रोनीक्स मीडिया जिमेदार हैं। अपनी निजी काम हेतु, फिल्म स्टार और राजनेताओं इलट्रोनीक्स मीडिया मीडिया को खूब इस्तेमाल करते हैं । इलट्रोनीक्स मीडिया अपनी टी.आर.पी बढ़ने कि चकर मैं, इन सभी को अच्छी खासी पब्लिसिटी दिल्वादेते हैं। अतः इलट्रोनीक्स मीडिया को सस्ती पब्लिसिटी से दूर रहना चाहिए। परंतु, सवाल उठती हैं - क्या सस्ती पब्लिसिटी बयान देना उचित हैं, जिस से लोगों कि भावनाओं को आहात पहंचे ? क्या लोगों को भी बिना समझे नेताओं कि बातो मैं प्रभावित होना चाहिए ? ये लोकतंत्र हैं, सायद ये सवालों का जबाब भी लोगों को ही देना हैं ।

Saturday, February 6, 2010

विभाजन की राजनीति और तेलंगाना

आज आंध्र प्रदेश मैं तेलंगाना को लेकर वहां की राजनीति गरमाई हुई हैं । पहले अलग राज्य की समर्थन मैं ,अब विरुद्ध मैं विरोध प्रदर्शन और सामूहिक बंद ने, लोगों की मुसीबत बढ़ा दी हैं । खैर, आज की तेलंगना मुधा, जो स्थानीय आधार पर दिया जा रहा हैं, व एक तरफ जाएज हैं और इसमें कोई नयापन भी नही हैं । इस के लिए भारत की तात्कालिन इतिहास के ऊपर नज़र डालना होगा । आजादी के वाद से ही, अनेक राजनेताओं ने स्थानीय भाषा के आधार पर अलग राज्य बनाने की कही, जो बाद मैं सफल भी हुआ । वैसे , आजादी से पहले सन १९३६ मैं, ही ओडिशा भाषा के आधार पर स्वतंत्र राज्य बन चका था । आज अनेक राज्य स्थानीय तथा खेत्रीय के आधार पर ही बतान हुआ हैं। तब स्थानीय राजनेताओं का तर्क था, स्थानीय वा भाषा के आधार पर राज्य बाँटने से स्थानीयता की पहचान बरकार रहेगी और विकाश मैं अछा मदत मिलेगी । परंतु, आज वक्त बदल चुका हैं और बदल चुका हैं , राजनीति की परिभाषा ।
समय के साथ ही , देश मैं फ्हिर अलग राज्यों के मांग तेजी से पकड़ रही हैं । बिहार को अलग करके झारखंड,
मध्य प्रदेश अलग करके छत्तिसगढ़ और उत्तर प्रदेश को अलग करके उत्तराखंड बनाने के लिए बहत पहले से मांग हो रहा था । आखिर, तत्त्कालिन वाजपयी सरकार ने नयी राज्य के लिए अमली जामा पहना दिया । उसके बाद से ही, आंध्र प्रदेश को अलग करके तेलंगना, महाराष्ट्र को अलग करके विधार्भ और प.बंगाल को अलग करके गोरखालैंड की मांग उठी। झारखंड बनाने के लिए शिबुसोरेन की झारखंड मुक्ती मोर्चा काफी दिनों से मांग कर रही थी । वेसें ही , टी.चंद्र शेखर राव ने तेलंगाना राष्ट्र समिति बना कर , हैदराबाद मैं आंदोलन चला रहे थे। वेसे तर्क यह दिया जा रहा हैं, इस से विकास की धारा आगे बढ़ेगी । यह तर्क से झारखंड की मौजुदा हालत, इस तर्क को विरोधाभास कर रही हैं ।
दश करोड़ से ऊपर आवादि वाले इस देश मैं आज गरीवी का जो चहेरा मिल रहा हैं, वाकई विकास की हकिकत को ज़ाहिर करती हैं । आजादी के बाद, इसी विकास के आधार पर विभाजित क्या गया था । परिणाम स्वरुप, देश मैं किसान आत्महत्या, गरिवी, के संख्या मैं दिन पे दिन बढ़त्तोरी और नक्सलवाद की रूप मैं उभरा हैं । नक्सलवाद भी, भारतीय आर्थिक स्थिती का एक कड़वा सच हैं । यह, सभी jअन्ते हैं , एक किसान विद्रोह से, आज भयंकर नक्सल के रूप मैं उभरा हैं । किया ये विकास की परिभाषा हैं ? क्या विकास केवल अलग तथा पृथक राज्य, विकास की परिभाषा हैं , चूँकि यह कहना गलत नहीं होगा, झारखंड और बिहार की मौजुदा स्थिती क्या हैं ? ओडिशा, छतीसगढ़ और तटीय आंध्र प्रदेश की स्थिति किया हैं ? जाहिर सी बात हैं , यह सारे सवालों की जबाब, हमारे नेताओं के पास नहीं हैं ।
दुनिया भर मैं, भारत एक विभिन्न धर्म, भाषा, और जाति होने के बावजूद, एक हैं । यह एक राष्ट्र की जीता जागता उदाहरण के रूप मैं मिसाल रहा हैं । परंतु, इन सब के आधार पर विकास होना असंभब नही, ये नामुकिन हैं ।
क्योंकि, हिस्से बटने से कभी विकास बढ़ता नही हैं, वल्कि विकास की धारा आगे वाढती हैं । उदाहरण स्वरुप, मंडल कमीशन को लागु कर के रिजर्वेसन ब्यवस्था कि गई। परंतु, आज भी उन आदिवासियों को इसका पूर्ण सफलता नहीं मिल रहा हैं , जो इसका हकदार हैं । हमारे नेता कहते हैं , बटने से विकास निरंतर होता हैं , आज यह आलम क्यों ? कोई सक नहीं, इस सारे सवाल की जवाब भी, हमारे नेताओं के पास नहीं हैं ।
अपनी स्वार्थ और महत्वकंख्या को पूरा करने हेतु , लोगों को वक्रा बना देना, यह कहाँ तक सही हैं ? वैसे, तेलंगना मुद्दे पर चंद्र शेखर राव, बहुत दिन से चुप चाप बैठे थे । व, पिछले यु.पी.ए मंत्री मंडल का हिस्सा भी बने थे । परंतु, हाल ही मैं, समाप्त हुआ विधान सभा और लोक सभा चुनाव आशानुरूप सफलता न मिलने के कारण, उनको अलग तेलंगना राज्य की ट्राम कार्ड खेलना पडा और उस मैं भी यह सफलता हुए । परंतु, रायलसीमा और तटीय आंध्र प्रदेश के विधायक और सांसद के विरोध प्रदर्शन हेतु, अब केंद्र और मुख्यमंत्री रोसैया की मुसीबत बढ़ा दिया हैं, और कोई भी हैदरावाद के तेलंगना की हिस्से मैं जाने के लिए तैयार नही हैं । क्योंकि, यदि तेलंगना राज्य बनता हैं, हैदराबाद भी तेलंगना की हिस्से मैं चला जाएगा । इसलिए , हैदराबाद को अब की चंडीगड़ की तरह बनाने की जारी हैं, फिलहाल इस के लिए कोई तैयार नहीं हैं । परंतु, यदी भविस्य मैं तेलंगना राज्य बनता हैं, हैदरावाद चार राज्यों का राजधानी बनेगा । जी हाँ, अलग तेलंगना राज्य गठन के बाद कभी भी रायलसीमा और तटीय आंध्र एक साथ नही रह पाएंगे । साथ ही , निश्चित रूप से हैदराबाद, चंडीगढ़ की तरह एक केंद्र शाशित प्रदेश बनेगा । अब हुआ ना, हैदरावाद चार राज्यों का राजधानी !
खैर, बात जो भी हो, केंद्र और आंचलिक दल, कोई भी फैसला लोगों की मत को जेहन मैं रख कर नहीं लेरहे हैं । सबको, अपनी पार्टी और खुद की राजनीति भविस्य की फिकर हैं । यह देश की भाग्य की विदवना हैं, देश की जनता, नेताओं को होता हैं । फिर भी, हम आशा करते हैं, कुछ दिन पहले बने, शांती सयुंक्त कमिति, एसा ठोस पहल करे, जिस से यह अलग राज्य की चिंगारी, आने वाले मैं दुवारा ना bha

Thursday, January 28, 2010

महंगाई के पटरी पर आम आदमी

साहाब ! मैं रिक्सा चलाता हूँ। मुझे यह एक जरिया हैं, जिस के तहत मुझे अपनी ४ सदस्य वालें घर को चलानी होती हें और यह महंगाई हमारे कमर तोड़ दी हैं । आखिर हम करे भी किया करे ? जी हाँ ! यह बात हैं , दिल्ली के महारानीवाग तथा आश्रम के सता भरत नगर के रिक्सा बालां की कहानी हैं। यह कहानी बताती हैं, केसे महंगाई, मद्यावित परिवार के लोंगो की हालत बहत नज्दुक करदिया हैं। इन दिनों सभी चीज दू- दूना भाव से अधिक दाम से मिल रहा हैं। परिणाम स्वरुप, खाना बनाने वालों दुकानदार भी दामों मैं वढ़ोतरी कर दिया हैं । अब दिल्ली मैं हर चीज महंगाई के आसमान छुं रा हैं ।
इन महंगाई से आम आदमी के अलावा स्टुडेंट भी झेल रहे हैं । क्यों की इन महाँगई से मध्यवित परिवार के स्टुडेंट को अपनी आर्थीक स्थिति से बहत तकलिप सहना पड़ रहा हैं । आम आदमी के साथ नारा देने वालें कांग्रेस और यु.पी.ए सरकार के साथ साथ दिल्ली प्रदेश शिला सरकार से तरफ भी राहत की और फल नहीं कर रहे हैं ।
चुनाव से फेले '' पालिटिकल स्टैंड'' के तहत केंद्र और दिल्ली प्रदेश के तरफ से महंगाई को रोकने के लिए जोरसोर से कोशिश किये थे। दोनों सरकार जनता से वादा किये थे, वे जल्दी ही मसले सुलझ देंगे। परंतु, हमेसा के तरह भारतीय नेता और सरकार को अपनी गढ़ी फिर मिलने के वाद , अपनी वडा भूलने का आदत हैं। केंद्र और दिल्ली प्रदेश सरकार को फिर अपनी गाड़ी मिल गया, वे तो लोगों को इस एहसान के वदले जेब करने मैं तुले हैं। वेसे, हर चीज की महंगाई से परेसान दिल्ली वासियों को पहेले बस की किराया उसके वाद मेट्रो और अब पानी की वढतोरी कीमतों ने बेहाल करदिया हैं। परंतु, इस महंगाई के वक्त भी, हमारे मंत्रीगण, अपनी सरकारी आवास छोड़कर, सरकारी पैसा से फाईफ स्टार होटल मई ठरते हैं, जिसका एक रात की किराया पांच लाख रुपया हैं । उदाहरण स्वरुप, विदेश मंत्री एस.एम.कृष्णा जी ने , एक फाईफ स्टार होटल मैं एक महीने तक ठरते थे। यदी, राजनैतिक नज़रों से कहा जाए, यह नौवत लगातार जनाधार की परिणाम हैं । यानी, किसी भी दल को कभी भी लगातार गढ़ी सोपना नही चाहिए । यदी, एसा करते हैं, दोलों मैं स्वेछाचार आजेयेगी और अपनी मनमानी पर उतर आयेगें । परिणाम आपके सामने हैं । जनता हमेसा नेताओं को यह येहेसास दिलाना जरुरी हैं, अछा काम कोरोगे हमारे साथ पाओंगे। खैर, यह भारतीय जनता हैं, जो भले hiइ कितने तकलिप सहें, परंतु नेताओं की मीठी वातों से सबकुछ भुल्जाते हैं । फिलहाल तो महंगाई की मार से दिल्ली वासियों को कोई राहत मिलने वालां नहीं हैं । इस से राहत पाने के लिए , वेसक दिल्ली वासियों को २०१२ तक इंतजार करना पडेगा। क्यों की, २०१२ मैं आम चुनाव हैं, जाहिर हैं, चुनाव के मधेनाजर वादों की पितारों से आकर केंद्र और प्रदेश सरकार महंगाई को रोकने के लिए कोशिश करेंगे।
इसलिए -
'' करते रही हैं , २०१२ तक की इंतजार,
झेलते रही हैं, महंगाई की मार '' ।

Thursday, December 31, 2009

राजनैतिक झलक- २००९

२००९ के सुरुवात से ही पूरे देश मै चुनाव को लेकर, राजनीति गहमागहमी रहीं । पूर्ब चुनाव कमिशनर टी.कृष्णमूर्ती का अब के चुनाव कमिशनर नवीन चावला के ऊपर कथित पख्यापात का आरोप लगाने साथ ही महामहिम राष्ट्रपति को हटाने के लिए पत्र लिखना , देश की चुनाव के इतिहास मैं पहली वार हुआ, जो चनाव के स्वच्छता के ऊपर फिर से सवाल खडी किया । फिर भी, आगे नवीन चावला के नेतृत्व मैं देश और तीन राज्यों के चुनाव सुचारू रूप से समपर्ण हुआ। लोक सभा चुनाव मैं , डॉ.मनमोहन सिंग कांग्रेस तथा यु .पी.ए फिर से गडीपाने मैं कामियाब हुए । वेसे ही, ओड़िसा मैं नवीन पटनायक, आंध्र प्रदेश मैं स्वर्गीय राज शेखर रेडी और सिकिम मैं, दोरोजी कुंडू फिर से सता के मलाई चखने के लिए कामियाब मिला । इस लोक सभा चुनाव मैं, पहली वार मीरा कुमार के रूप मैं लोक सभा की प्रथम महिला वाचस्पती बनी। पूर्ब आ.ई.ऍफ़.एस ऑफीसर मीरा कुमार बिहार के सासाराम संसदीय खेत्र से प्रतिनिधित्व करते हें और व बिहार के पूर्ब मुख्यमंत्री जगतजीवनराम के पुत्री
इस साल की चुनाव मै सब से जादा ५५ महिला संसाद के रूप मै चुनाव जीत कर संसद पहंचे। जिस से ठंडे बस्ते मै पड़ी, ''महिला रेजर्वेसन'' विल को फिर से जान मिल गया। उमीद के मुताविक, सरकार संसद मैं ''महिला रेजर्वेसन'' को पेश किया । जिस को जद (यू) , समाजवादी पार्टी और लालु जी की आर.जे.डी इस वील को विरोध किया, जब की बाक़ी दल ने इस विल को सहमति जताई । इस के लिए , संसद मैं कुछ दिन सोरसरवा भी हुआ। इस साल की राजनीतिक इतिहास मै एक दुखद घटना भी घटी। आंध्र प्रदेश के पूर्ब मुख्यमंत्री स्वर्गीय राजशेखर रेडी एक हेलिकेप्तर हादसा मैं मौत होगया। वास्तब मैं, यह एक बहत ही दुखद घटना था । इस के साथ ही, प.बंगाल मैं के लाल गढ़ मैं माओवादियों की हिंसा और भुबनेश्वर राजधानी को अगवा करना, बंगाल मैं कम्युनिस्ट सरकार का कोमजोरी कड़ी को सब के सामने लेआया। वेसे ही, ओड़िसा मैं विधान सभा के एक दीन बढाकर
जल्दवाजी मैं ''विश्वविद्यालय विल'' को परीत करना भी राजनैतिक खबरों मैं सुर्खिया बनी ।
पूर्ब केंद्रमंत्री जसवंत सिंह को अपनी अपती जनक तिपनी के लिए भाजपा से हटाना और आर.एस.एस का नयी युवाओं के हाथों मैं, भाजपा की स्टीयरिंग दिलाने ले लिए आडवानी और राजनाथ सिंह को अपने पद से इस्ताफा देना भी राजनीती गरमा रखा । संसद और देश के विभीन्न प्रदेशों की विधान सभा मैं महंगाई को लेकर सदन की कार्य मैं वार वार रुकावट बनी । जब की महारास्त्र के विधान सभा चुनाव मैं कांग्रेस-एन.सी.पी गठ्वंधन को फिर से बहुमत मिली और राज ठाकरे की एम्.एन.एस ने शिवसेना-भाजपा गठ्वंधन की वोट बैंक मैं सेंध मारकर अपनी जीत का परचम लहराया। वेसे ही ओड़िसा मैं खान की घोटला से परेसान ओड़िसा सरकार सदन की कार्य पूरे होने से १५ दिन पहले ही सदन को स्थगित करना और इस के विरुद्ध मैं ''प्रतीक विधानसभा'' चलना वाकई राजनैतिक पंडितों को हैरान करदिया। साथ ही, १७ साल वाद , संसद मैं लिब्रहान आयोग की रिपोर्ट पेश करना, विपख्य के विरोध हेतु, संसद की कार्य मैं वार वार वाधा उपजी और सदन को वार वार मूल तबी किया गया । इस के अलावा, तेलंगाना राज्य गठन karne के लिए, हैदरावाद मैं अनसन करना और उस के वाद केंद्र के तरफ से हरी झंडी दिखाना, आन्ध्र के राजनैतिक माहोल मैं भूचाल लाया । केंद्र की इस फैसला को रायलसीमा और तटीय आंध्र के सभी संसद और विधायक सामूहिक त्यागपत्र देना, प्रदेश की राजनीति गर्माया । गौरतलब हें, यदी तेलंगाना गठन होता हें, हैदरावाद तेलंगाना की हिस्से मैं चलाजायेगा। जिस को रायलसीमा और तटीय आन्ध्र के नेता विरोध कर रहे हें । वहाँ, अब भी स्तिथी मैं सुधर नही हुआ हें । इस इस साल के आखिर मैं, वीजेपी की वागदौर राजनाथ के बदले नागपुर के नितीन गडकरी ने कमान संभाली, जब की विपख के नेता के रूप मैं आडवानी के बदले दिल्ली के सुषमा सवराज संभाली। जब की दल के संम्भिधान मैं एक संसोधन लाकर अडवानी को भाजपा संसदीय दल के नेता और यू.पी.ए तरह एनडीए की कमान आडवानी के हाथो थमाई गयी। एन.डी.ए की संजोजक के रूप मैं जेडयू के सरद यादव बनाया गया, जॉब की राज्य सभा मैं विपख्य नेता अरुण जेटली को नही बदला गया।
इस साल की राजनैतिक आकाश मैं उजाला और अन्धेरा के विच खूब छुपा रुस्तम खेला गया । यह आगे और बढ़ने की संम्भावना हें । कियों की, अब झारखण्ड की चनाव परिणाम आचुकी हें, और इस से सुरु होगी राजनीति काउनडाउन - २०१० । इस के अलावा, तेलंगाना मुधा , लिब्रहान कमीशन की रिपोर्ट, २०१० की राजनीति को पूरा गरम रखेगी। जब की, महिला रेजर्वेसन विल के ऊपर गिरिजा ब्यास कमीटी की रिपोर्ट और अल्पसंख्यक को रेसेरवेसन देना जेसे विषय नयी साल की राजनीति की तापमान ऊपर रहेगा । इस के अलावा, विपख्य के नयी नेत्री और भाजपा के नया प्रमुख के कामकाज केसा रहेगा, यह देखनेलायक होगी । खैर, बात जो भी हो , हम तो यह आशा करते हें, इस सारे समस्याओं का जल्द से जल्द समाधान हो । परन्तु , यह आशा करना बेबकुफ़ी होगी, नयी साल की राजनैतिक तापमान, इस साल की राजनैतिक तापमान से कम होगी ।